भारत में विकलांगता: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के विशेष संदर्भ में
| Vol-3 | Issue-09 | September 2018 | Published Online: 07 September 2018 PDF ( 201 KB ) | ||
| Author(s) | ||
अनुराग तिवारी
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1शोधार्थी, मालवीय शांति अनुसंधान केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी |
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| Abstract | ||
विकलांगता या आधुनिक संदर्भों में कहें तो दिव्यांगता एक ऐसी शारीरिक एवं मानसिक क्षति है जिससे प्रभावित कोई व्यक्ति सामान्य व्यक्तियों की तरह किसी कार्य को करने में असमर्थ होता है। अगर तकनीकी दृष्टिकोण से देखें तो विकलांग एवं विकलांगता दोनों ही व्यापक संदर्भ वाले शब्द है जिनकी परिभाषाएँ भी एक से अधिक और परिवर्तनशील रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, विकलांगता को एक ऐसी अक्षमता के रूप में चिन्हित करता है जिसके कारण इससे प्रभावित व्यक्ति उस ढंग से कार्य करने में असमर्थ होता है जैसा कि एक सामान्य व्यक्ति कर सकते है। वही भारतीय व्यवस्था के अंतर्गत ऐसे व्यक्ति को विकलांगता की श्रेणी में रखा जाता है (भारतीय व्यवस्था में विकलांगता के लिए श्रेणी का उल्लेख भी किया गया है) जो चिकित्सा अधिकारी द्वारा प्रमाणित 40 प्रतिशत से कम विकलांगता से ग्रसित न हो। भारतीय व्यवस्था में विकलांगता का मापदंड विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा स्वीकृत विकलांगता की परिभाषा से भिन्न एवं छोटे या सीमित दायरे वाला है। यही कारण है कि जहाँ विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व की 15 फीसदी आबादी विकलांगता से ग्रसित है, वहीँ भारतीय मानकों के अनुसार 2011 की जनगणना के आधार पर देश की कुल आबादी का 2.21 प्रतिशत या 2.68 करोड़ लोग विकलांगता से ग्रसित है। 2011 की जनगणना में 8 प्रकार की विकलांगताओं को सम्मिलित किया गया था वहीँ 2016 में पारित दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम में इस परिधि का विस्तार करते हुए 21 प्रकार की विकलांगताओं को चिन्हित किया गया है। प्रस्तुत आलेख में विकलांगता के प्रति भारतीय समाज का क्या दृष्टिकोण रहा है, दिव्यांग शब्द को गढ़ने का कारण तथा दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 पर प्रकाश डाला गया है। आलेख के अंत में उन महत्वपूर्ण उपायों की चर्चा की गयी है जो दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण हेतु प्रभाव डाल सकते है। |
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| Keywords | ||
| विकलांगता, दिव्यांगता, भारतीय समाज, संयुक्त राष्ट्र संघ, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम। | ||
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