भारत में लोकनीति निर्माण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण-मूल्यांकन
| Vol-5 | Issue-3 | March-2020 | Published Online: 16 March 2020 PDF ( 408 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ आशुतोष मीना 1 | ||
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1असिस्टेंट प्रोफेेसर (लोक प्रशासन) राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय आबूरोड |
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| Abstract | ||
भारतीय संविधान में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उल्लेख होने के बावजूद आमजन, शिक्षित वर्ग, शिक्षाविद्, लोकसेवक, विद्याथियों और राजनेताओं के चिन्तन व सोच में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भाव संतोष जनक नहीं कहा जा सकता। आर्थिक-सामाजिक विकास, गरीबी उन्मूलन, आधारभूत संरचना निर्माण, औद्योगिक विकास इत्यादि के लिए सरकार नीतियाँ बनाती है, इन नीतियों के आधार पर ही निर्णय व योजना का क्रियान्वयन किया जाता है। देश को स्वतंत्र हुए सात दशक बीत चुके और ’वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ को संविधान में मौलिक कर्तव्यों के रूप में शामिल हुए भी 45 वर्ष हो चुके हैं। भारत की जनसंख्या 130 करोड़ को पार कर चुकी है। भारत मानव श्रम के मामले में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। इसके बावजूद प्राद्योगिकी व तकनीक के क्षेत्र में हमारा देश आत्मनिर्भर नहीं है बल्कि विदेशी तकनीक पर निर्भर है। आज भी देश का बडा़ हिस्सा भुखमरी, गरीबी, अभाव व अन्याय से ग्रसित है। मूल्यांकन करने पर पता चलता है कि भारत में समस्याओं को समझने व समाधान के लिए वैज्ञानिक व तार्किक प्रयास नहीं किए जाते। सरकार द्वारा भी नितियाँ बनाते समय वैज्ञानिक दृष्टिकोण की उपेक्षा व आम जनमानस की परंपरागत मान्यताओं को ध्यान में रखा जाता है। इस आलेख में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का नीति-निर्माण में आवश्यकता व महत्व का विश्लेषण किया गया है |
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| Keywords | ||
| भारतीय संविधान, भुखमरी, गरीबी | ||
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