भारत में पंचायती राज व्यवस्थाः सिंहावलोकन
| Vol-4 | Issue-01 | January-2019 | Published Online: 10 January 2019 PDF ( 146 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ. कुमकुम शर्मा 1 | ||
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1सहायक आचार्य, राजनीतिक विज्ञान विभाग, सेन्ट विल्फ्रेड पी.जी. काॅलेज, मानसरोवर, जयपुर राजस्थान (भारत) |
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| Abstract | ||
1880 से 1884 के मध्य का ब्रिटिश काल भारत में पंचायती राज का स्वर्ण काल माना जाता है। इस संदर्भ में लोकतांत्रिक स्वायत्तशासी संस्थाओं का उल्लेख भारत के प्राचीनतम ग्रथ “ऋग्वेद“ में मिलता है। जिसका उल्लेख ‘सभा’ एवं समिति के रुप में किया गया है। ग्रामीण स्तर पर यह स्वायत्तशासी संस्थाये (पंचायत) केन्द्र में राजनीतिक हलचल के बावजूद भी सत्ता परिवर्तन से निष्प्रभावित रही तथा आदिकाल से लेकर वर्तमान तक निरन्तर किसी न किसी रुप में कार्यरत रही है। अतः पंचायती राज संस्थाओं को लोकतंत्र की सबसे छोटी संवैधानिक इकाई माना गया है। |
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| Keywords | ||
| स्वायत्तशासी संस्थाएँ, ग्रामीण स्वशासन,सामुदायिक विकास कार्यक्रम, पंचायती राज, समितियाँ संविधान संशोधन। | ||
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