भारतीय विदेश नीति का बदलता स्वरूप (1947-2018)
| Vol-3 | Issue-09 | September 2018 | Published Online: 07 September 2018 PDF ( 112 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डा0 मनोरमा कुमारी 1 | ||
|
1राजनीतिक विज्ञान |
||
| Abstract | ||
विदेश नीति और राजनय को अन्र्तराष्ट्रीय संबंधों के संचाालन की प्रक्रिया के यान के दो पहिये कहा जा सकता है। आज कोई भी देश आत्मनिर्भर नहीं है। राज्यों की एक दुसरे पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। व्यक्तियों की भांति राज्य भी अपने हितों की अभिवृद्धि का निरंतर प्रयास करते रहते है।इन हितों को राष्ट्रीय हित कहते है। प्रत्येक रज्य अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए विदेश नीति का निर्घारण करता है। किसी भी राज्य की विदेश नीति मुख्य रूप से कुछ सिद्धांतों, हितों एवं उद्देश्यों का समूह होता है जिनके माध्यम से वह राज्य दुसरे राष्ट्रों के साथ संबंध स्थापित करके उन सिद्दांतों की पूर्ति करने हेतु कार्यरत रहता है। भारत ने स्वतंत्रता के बाद जिस विदेश नीति का निर्माण किया वह देश की सभ्यता, संस्कृति तथा राजनीतिक परंपरा को प्रतिबिंवित करती है। भारत की विदेश नीति, निर्माताओं के समक्ष प्राचीन विद्वान कौटिल्य का दर्शन उपलब्ध था। प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने सम्राट अशोक के आदर्शो पर चलने का निश्चय किया और अन्र्तराष्ट्रीय शांति तथा अन्र्तराष्ट्रीय विवादों को शांतिपूर्ण समाधान जैसे मुल्यों को संविधान में शामिल किया तथा गुटनिरपेक्षता को अपनी विदेशनीति विदेश नीति में महत्वपूर्ण स्थान दिया। प्रमुख बिन्दुः- विदेश नीति का अर्थ। |
||
| Keywords | ||
| विदेश नीति राजनय, गुटनिरपेक्षता, कष्मीर समस्या, डोकलाम विवाद संयुक्त राष्ट्र संघ, परमाणु परीक्षण। | ||
|
Statistics
Article View: 406
|
||

