भारतीय और पाश्चात्य कवियों में ‘‘काव्य लक्षण’’ के सामंजस्य जनिक विशेषताओं का समन्वय

Vol-4 | Issue-04 | April 2019 | Published Online: 15 April 2019    PDF ( 272 KB )
Author(s)
डाॅ. पी. बी. महानंदे 1

1जनता महाविद्यालय चंद्रपूर

Abstract
आदि काल से ‘काव्य’ को जानने-पहचानने का प्रयास विद्वानों द्वारा किया जाता रहा हैै, और आज भी यह प्रयास पूरी गति से चल रहा है। इस समस्त प्रयास का विवेचन करने से पूर्व यदि ‘काव्य’ शब्द से ही जान-पहचान प्रारंभ की जाय तो  अनावश्यक न होगा। प्राचीन साहित्य में जो महत्व ईश्वर-भक्ति को मिला था, लगभग वही महत्व स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में भारतीय कविता में राष्ट्रिय भावना सभी युग के साहित्यकार के हदय में किसी न किसी रूप में व्याप्त रही है। वैदिक ऋषियों ने इसे ‘‘सर्वे सन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामय’ कहकर एक प्रकार से विस्तृत राष्ट्रिय भावना का परिचय दिया था। राष्ट्रियता की भावना का संबंध राजनीतिक गतिविधीयों से चालित प्रतित होता है, किंतु युगानुकूल परिस्थिती के अनुरूप इसका स्वरूप परिवर्तित होता रहा है। और भविष्य में भी इसमें परिवर्तन की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। प्राचीन एंव मध्यकालीन कवियों की राष्ट्रियता को निम्न श्रेणी का बताकर उसे राष्ट्र भक्ति न कहकर राज भक्ति की संज्ञा दी गई है। इस वर्ग के विचारकों का अभिमत है कि चंदबरदायी, भूषण आदि ने संकुचित राष्ट्रियता का परिचय दिया है। कभी-कभी उन्हें साम्प्रदायिकता का पोषक तक कह दिया है। यदि हम अपनी प्रगतिवादी विचारधारा के प्रकाश में चंद और भूषण को संकुचित दृष्टि का कवि कहते है, तो आज से सौ, दो सौ वर्ष बाद या जब कभी विश्व सरकार जैसी संस्था की कल्पना साकार हो जाएगी तो उस काल के विचारक आज की हमारी राष्ट्र भक्ति में संकिर्णता का दर्शन करेंगे। अतः हमें अपनी दृष्टि को ही सर्वत्र आरोपित न कर तत्कालीन मान्यताओं के परिप्रेक्ष्य में विचार करना होगा। आधुनिक अर्थो में राष्ट्रिय भावना का उन्मेश हिंदी साहित्य में आधुनिक काल से हुआ है। भारतेंदु को हिंदी का प्रथम राष्ट्रवादी कवि माना जा सकता है।
Keywords
सामंजस्य- संगति, औचित्य, अनूकुलता; समन्वय-संयोग, संबध्द फल; ग्राहय-ग्रहण करना, आत्मसात; अंलकारमयी - रचनागत शब्द योजना; यथार्थवाद - सत्य, प्रकृत, उचित
Statistics
Article View: 588