बनारस परिक्षेत्र की कविताओं का भाषा शिल्प एक अध्ययन

Vol-4 | Issue-9 | September 2019 | Published Online: 16 September 2019    PDF ( 139 KB )
Author(s)
प्रशांत कुमार बौद्ध 1

1शोधार्थी, राजस्थान केन्द्रीय विश्विद्यालय

Abstract

सिद्धों ने प्राकृत भाषा को छोड़कर लोक-भाषाओं में काव्य-रचना की परम्परा आरम्भ की। भोजपुरी कविता का आरम्भिक रूप गोरखनाथ की “बानी” और सिद्ध-नाथ कवियों की रचनाओं में मिलता है। प. दामोदर के उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण (12 वीं शताब्दी) में उस समय के भोजपुरी शब्दों का प्रयोग सबसे पहले मिलता है। भोजपुरी के बहुत से गाथा-काव्यों का रचना काल भी वहीं है। उसके बाद कबीर, धरमदास, घरनींदास , गुलालसाहब, मीखा साहब, लक्ष्मी सखी जैसे सन्त कवियों ने अपनी प्रेमपरक रहस्यमयी वाणी से इस परम्परा को समृद्ध किया। इस काल के कवियों की रचनाओं की भाषा देखने से स्पष्ट हो जाता है कि गोरखनाथ के शिष्य भरथरी के समय से ही भोजपुरी ने प्राकृत अथवा अपम्रंश का साथ पूर्ण रूप से छोड़ दिया था। बनारसी भोजपुरी न केवल समर्थ काव्य-भाषा के रूप में विकसित हो गयी थी, बल्कि अपनी अभिव्यंजना-शक्तिं, शब्द-सम्पदा और मुहावरों आदि से इतनी समर्थ हो गयी थी, कि कबीर आदि की कविताओं पर भी उसका प्रभाव पड़ा ।

Keywords
भोजपुरी, बानी, उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण, प्रेमपरक, प्राकृत, अपम्रंश, समर्थ, अभिव्यंजना-शक्तिं, शब्द-सम्पदा, मुहावरों
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