फतेह शाही विद्रोह: फिरंगी सरकार के विरूद्ध भारत का प्रथम क्षेत्रीय प्रतिरोध
| Vol-4 | Issue-03 | March 2019 | Published Online: 15 March 2019 PDF | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ॰ राजीव नयन 1 | ||
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1एसोसिएट प्रोफेसर-सह-विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग, जगजीवन काॅलेज, आरा, वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा, भोजपुर, बिहार |
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| Abstract | ||
प्लासी के युद्ध (1757 ई॰) में विजय-प्राप्ति के उपरांत अंग्रेजों ने अपनी सर्वोच्चता स्थापित कर दी। 1765 ई॰ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल की ‘दीवानी’ हासिल की। तत्पष्चात्, इसने राजनीतिक विस्तार आरंभ किया और शनैः शनैः पूरे भारत को विजित कर लिया। लेकिन, पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को अपने अधीनस्थ करने में अँग्रेजों को लगभग एक शताब्दी का कालखण्ड व्यतीत करना पड़ा। यह इतना सहज और आसान भी नहीं था; क्योंकि उन्हें भारतीयों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। 1857 ई॰ के विद्रोह के पूर्व भी अनेकानेक प्रतिरोध हुए थे, जिन्होंने फिरंगियों को लोहे के चने चबाने हेतु मजबूर कर दिया था। भारत में विदेषी शासन के विरूद्ध 1765 ई॰ में फतेह बहादुर शाही के द्वारा प्रथम विद्रोह का शंखनाद किया गया था। फतेह बहादुर शाही बिहार के सारण जिले के पष्चिमी भाग में अवस्थित हुसेपुर इस्टेट् ;भ्नेमचनत म्ेजंजमद्ध के शासक थे। दीवानी-प्राप्ति के उपरांत ‘कंपनी’ बंगाल की असली राजस्व-मलिका बन गई थी और जब उसने हुसेपुर इस्टेट् से ‘कर’ ;ज्ंगद्ध वसूली करनी चाही, तब फतेह शाही ने, न केवल ‘कर’ देने से इंकार कर दिया था, अपितु कंपनी के विरूद्ध विप्लव आरंभ कर दिया। प्रत्युत्तर में कंपनी ने विषाल सषस्त्र बल को हुसेपुर भेजकर फतेह शाही को हुसेपुर का किला छोड़ने हेतु विवष कर दिया। फतेह शाही को भागकर गोरखपुर और सारण के बीच विस्तृत ‘बाघ-जोगिनी’ ;ठंही.श्रवहपदपद्ध के घने वन-क्षेत्र में शरण लेनी पड़ी और उसने यहीं से कंपनी के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध आरंभ कर दिया। फतेह शाही के द्वारा किये जा रहे लगातार हमलों और छापों से कम्पनी के अधिकारियों, एजेण्टों एवं कारिन्दों में दहषत व्याप्त हो गई थी। वस्तुतः, प्लासी के युद्ध में मीर जाफर की गद्दारी ने बिहार के लोगों को बदहाली के कगार पर पहुँचा दिया था। फतेह शाही के विद्रोह को प्लासी के युद्ध के बाद कंपनी के विभिन्न अत्याचारों से उत्पन्न 18वीं शताब्दी के भारत की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दुर्दषा की पृष्ठभूमि में समझने की आवष्यकता है। |
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| Keywords | ||
| ईस्ट इण्डिया कम्पनी, जन विद्रोह, किसान, जमींदार, शोषण, व्यापार, उद्योग, मंडी, प्लासी, दीवानी, राजस्व, लगान, मालगुजारी, दुर्भिक्ष, कृषक प्रतिरोध, क्षेत्रीय प्रतिरोध, उपद्रव, संन्यासी। | ||
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