प्राचीन भारत में विद्यार्जन की पद्धतियों का एक विश्लेषणामक अध्ययन
| Vol-2 | Issue-3 | March 2017 | Published Online: 23 March 2017 PDF ( 195 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| Dr.Sanjay Kumar 1 | ||
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1Dept. of A.I.S.A.S History, Magadh University Bodh Gaya , Bihar |
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| Abstract | ||
भारत प्राचीन काल से शिक्षा-प्राप्ति का मुख्य केन्द्र रहा है। प्राचीन काल में भारत की शिक्षा प्रणाली अति विशिष्ट थी। आध्यात्मिक तथा भौंतिक उत्थान एवं विभिन्न उत्तरदायित्वों के विधिवत निर्वाह में प्राचीन भारत में विद्या अर्जन की पद्धति तत्कालीन मानव-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को आलोकित कर सही दिशा निर्देश देने में सक्षम थी। पौराणिक ग्रन्थों के उद्धरण ‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’, ‘‘नास्ति विद्यासमं चक्षुनास्ति सत्यसमं तापः’’ आदि उद्धरण से प्राप्त ज्ञान समस्त तत्वों के मूल को जानने में सहायक रहा है। इसी प्रकार ‘‘बुद्धिर्यस्य बलं तस्य’’ अर्थात् विद्यार्जन द्वारा प्राप्त एवं विकसित की गयी बुद्धि ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति होती है। वस्तुतः प्राचीन भारत के ऐतिहासिक तथ्य यह रेखांकित करते हैं कि विभिन्न विधाओं में अर्जित ज्ञान के द्वारा मानव ने कर्मशील व्यक्ति के रूप में निपुणता को प्राप्त किया है। प्रस्तुत शोध-आलेख भारत की अति प्राचीन व्यवस्था में विद्या अर्जन की प्रमुख पद्धतियों का एक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। जिसमें तत्कालीन समय में विभिन्न विधाओं में निपुणता प्राप्त करने के लिए विद्या अर्जन से संबंधित महत्ववपूर्ण पद्धतियों का विवरण प्रस्तुत किया गया है। |
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| Keywords | ||
| निर्वाह, निपुणता, आलोकित | ||
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