प्राचीन भारत में पशुपालन (वैदिक काल से गुप्त काल तक)
| Vol-5 | Issue-8 | August-2020 | Published Online: 17 August 2020 PDF ( 119 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i08.044 | ||
| Author(s) | ||
डाॅ0 मनीष कुमार
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1एम.ए. (इतिहास), नालन्दा खुला विश्वविद्यालय, पटना/ पी-एच0डी0, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर (बिहार) |
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| Abstract | ||
प्रस्तुत आलेख में प्राचीन भारत में पशुपालन की स्थिति और उसके विकास का वर्णन किया गया है । मानव सभ्यता के विकास मे प्रारंभ से ही पशुओं का योगदान अत्यंत ही महत्वपूर्ण रहा है। भूमि के अतिरिक्त मनुष्य के विभिन्न आर्थिक कार्यों के आधार पशु भी थे। पशुओं ने प्राचीन भारत के आर्थिक,सामाजिक,राजनैतिक एवं धार्मिक जीवन को कई प्रकार से प्रभावित किया। सैन्धव काल मे भी पशुओं ने वहाँ के आर्थिक और धार्मिक व्यवस्थाा को प्रभावित किया। वैदिक युग मे पशु ही आर्थिक मानदण्ड के आधार थे। इस युग मे पशुओं ने सामाजिक और धार्मिक जीवन को प्रभावित ही नहीं किया बल्कि एक नया आयाम दिया। मौर्य और गुप्त काल मे सैनिक दृष्टि से पशु बड़े उपयोगी सिद्ध हुये दोनांे युगों की कला में पशुओं को महत्वपूर्ण स्थान मिला। पशु अधारित कृषि व्यवस्था ने भारत में पशुपालन की महत्ता को और अधिक बढ़ाया। |
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| Keywords | ||
| आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक | ||
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Statistics
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