प्राचीन भारतीय सामाजिक संस्थान आश्रम व्यवस्था

Vol-3 | Issue-01 | January 2018 | Published Online: 28 January 2018 PDF
Author(s)
Ashvani Kumar 1

1Department of History, KMGGPG college Badalpur (Gautam Buddha Nagar UP)

Abstract

प्राचीन भारतीय ऋषियों ने मनुष्य की आयु का सामान्य औसत मानकर उसे चार बराबर भागों में विभक्त कर चतुराश्रमों की व्यवस्था की थी। इस प्रकार की व्यवस्था के मूल में मानव जीवन की विभिन्न अवस्थाओं के मनोवैज्ञानिक सामाजिक व्यवहारों तथा नैतिक विचारों को समाविष्ट किया गया है। आश्रम शब्द 'श्रम' धातु से निष्पन्न है, जिसका तात्पर्य है श्रम या परिश्रम करते-करते ठहरने का स्थान। अस्तु आश्रम का सांस्कृतिक अर्थ होता है मनुष्य जीवन का वह काल खण्ड, जिसमें वह श्रमपूर्वक जीवन-यापन करते-करते कुछ काल के लिए ठहर जाता है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत मनुष्य अपने जीवन के प्रत्येक अवस्था में श्रमपूर्वक विभिन्न आश्रम धर्मों एवं कार्यों को संपादित करता था। वस्तुतः ऋग्वेद में चतुराश्रम व्यवस्था के स्पष्ट प्रभाव तो प्राप्त नहीं है किन्तु इसमें ब्रह्मचारी, गृहपति तथा यति या मुनि शब्दों का प्रयोग मिलता है। उत्तरवैदिक काल में जैसा कि ऐतरेय ब्राह्मण, तैतिरीय संहिता तथा शतपथ ब्राह्मण में निर्दिष्ट है-

 ब्रह्मचर्याश्रम समाप्य गृही भवेत्                         गृही भूत्वा वनी भवेत् वनी भूत्वा प्रव्रजेत ।।¹

 आश्रम का उल्लेख उपनिषदों में भी हुआ है। बृहदारण्यकोपनिषद्², जाबालोपनिषद्³ तथा श्वेताश्वतरोपनिषद् में चारों आश्रमों. आश्रमादि नियमों का निर्देश किया गया है। विशेष रूप से उपनिषदों के समय व्यवस्थित चतुराश्रम व्यवस्था सूत्रकाल में जाकर पूर्णतः नियमबद्ध तथा व्यवस्थित हो गयी। सूत्रकारों ने तथा कालान्तर में स्मृतिकारो  ने क्रमशः आश्रम-आचरणो,नियमों तथा धर्मों को व्यवस्थित रूप दिया। महाभारत तथा पुराणों में आश्रम व्यवस्था की दैवी उत्पत्ति व्याख्यायित है। पुराणों में वर्ण व्यवस्था की भाँति आश्रम व्यवस्था को भी देवोद्भूत बताया गया है। पुराणों में आश्रम व्यवस्था को सामाजिक संतुलन का आधार बताते हुए उसका संश्रय-स्थान विष्णु को स्वीकार किया गया है।

Keywords
आश्रम, संस्कार, यज्ञोपवित संस्कार, उपनयन संस्कार, गुरुकुल, प्रवृत्ति, निवृत्ति, ब्रह्म चिंतन, सिद्ध क्षेत्र ।
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