पर्यावरणीय चेतना और जागरुकता के प्रसार में बाल पत्रिकाओं की भूमिका

Vol-5 | Issue-7 | July-2020 | Published Online: 15 July 2020    PDF ( 190 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i07.017
Author(s)
डाॅ. मनीषा शर्मा 1; श्रीमती वंदना बघेल 2

1शोध निर्देशक, एसोसिएट प्रोफेसर, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय, विश्वविद्यालय, अमरकंटक (म.प्र.)

2शोधार्थी, हिन्दी साहित्य, 3157/ई सेक्टर, सुदामानगर, इन्दौर (म.प्र.)

Abstract

वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण की समस्या चुनौती बनकर उभरी है। प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन, नवीनीकरण, औद्योगिकरण, जंगलों का तेजी से खत्म होना और विकास के नाम पर हरे-भरे जंगलों के स्थान पर कांक्रीट की इमारतें ये सब मनुष्य की भौतिकवादी और भोगवादी प्रकृति का परिणाम है जिसका खामियाजा कई बार विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं और त्रासदी के रूप में सामने आता है। भारत की परंपरा सदैव प्रकृति पूजक रही है। हमनें विभिन्न परंपराओं एवं संस्कारों के रूप में मनुष्य और प्रकृति के बीच सदैव सामंजस्य का भाव रखा परन्तु वर्तमान में युवा पीढ़ी इन सबसे विमुख हो गई है। यदि हमें इस पीढ़ी को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार बनाना है तो बचपन से हमें उनके हृदय में पर्यावरण बोध उत्पन्न करना आवश्यक है। बाल्यावस्था से ही बच्चों में संस्कार के रूप में पर्यावरण के प्रति जागरुकता उत्पन्न करने में बाल साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर सकता है। प्रस्तुत शोध पत्र में हिन्दी की बाल पत्रिकाएँ किस प्रकार पर्यावरणीय चेतना के प्रति बच्चों को जागरुक कर रही हैं, विषय पर अध्ययन केन्द्रित है। जिसमंे विभिन्न बाल पत्रिकाओं में प्रकाशित पर्यावरणीय चेतना से संबंधित सामग्री के अध्ययन द्वारा विषय का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है।

Keywords
पर्यावरण, चेतना, बाल पत्रिकाएँ।
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