पंचायती राज एवं पर्यावरण संरक्षण- एक अध्ययन
| Vol-5 | Issue-6 | June-2020 | Published Online: 15 June 2020 PDF ( 133 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i06.009 | ||
| Author(s) | ||
डाॅ. फूलसिंह गुर्जर
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1सह-आचार्य एवं विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, झालावाड़ (राज0) |
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| Abstract | ||
पर्यावरण असंतुलन मानव, प्रकृति और जीव जन्तु के लिए ही खतरा नहीं अपितु मानवीय व सामाजिक वातावरण के लिए भी खतरा बना हुआ है। प्रारम्भ में मानव व पारिस्थितिकी अन्तर्सम्बन्ध सन्तुलित थे, जैसे जैसे जनसंख्या वृद्धि, अन्धाधुन्ध वनों की कटाईं वन जीवों का शिकार, तकनीकी ज्ञान का विकास एवं प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो गई है। विकास को स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त मानने वाले राजनेता और विद्वान यह भूल गये है कि अनियंत्रित विकास हमे विपदा की ओर ले जाता है। विकास को समुचित व समन्वयकारी बनाने के लिए पंचायत राज संस्थाओं को अधिक मजबूत और लोकतांत्रिक बनाने की आवश्यकता है। पर्यावरण संकट की समस्या विश्व व्यापी होने के कारण राज्य, सरकार या पंचायतों की ही जिम्मेदारी नहीं है बल्कि प्रत्येक नागरिक को अपनी जीवन शैली को बदलने, सचेत व जागरूक एवं पर्यावरण संरक्षण के अनुरूप करनी होगी। इन सब बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए इस लेख में पर्यावरण संरक्षण में पंचायत राज संस्थाओं की भूमिका का एक अध्ययन किया गया है। |
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| Keywords | ||
| पंचायती राज, पारिस्थितिकी, पर्यावरण, जैविक, अजैविक, ग्लोबल वाॅर्मिंग, परावलम्बन, सत्त विकास, थानक, बोधि वृक्ष, फड़ कला, कापड़ कला, पाठों कला, संज्या, ओरण, सब भूमि गोपाल की, गो ग्रीन, 3तए रिसाइकल, रीड्यूस और री-यूज | ||
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