नागार्जुन के उपन्यायों में सामाजिक जीवन पर चिन्तन
| Vol-4 | Issue-03 | March 2019 | Published Online: 13 March 2019 PDF ( 123 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| सीमा 1; डा0 दर्शना 2 | ||
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1शोधकत्र्ता, कलिंगा विश्वविद्यालय, नया रायपुर 2शोध निर्देशक, कलिंगा विश्वविद्यालय, नया रायपुर |
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| Abstract | ||
साहित्य सामाजिक चेतना का प्रतिबिम्ब होता है। यह कथन अंशतः ठीक भी है किन्तु साहित्य को केवल युग सापेक्ष कहना भी ठीक नहीं। यह केवल दर्पण नहीं जिसमें समय की परछाई पड़ती है, बल्कि यह एक क्रियात्मक और निर्माणकारी शक्ति भी है, जिसके द्वारा समाज और युग अपने रूप विधान की प्रेरणा पाता है।1 साहित्य की यह शक्ति गतिहीन अथवा जड़ नहीं, जो केवल एक समय किसी विशेष परिस्थिति वश जागरूक हो गई, फिर कुछ समय के लिए सुप्त अथवा निष्क्रिय हो गई। वरन् साहित्य काल क्रम में बंधा हुआ एक ऐसा चिरन्तन प्रवाह है, जो मानव सृष्टि के आदिकाल से ही जब से मनुष्य में कलात्मक रचना की प्रतिभा मुखरित हुई, भिन्न-भिन्न रूप में उसके अंदर की कशमकश अभिव्यक्त हुई है। |
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| Keywords | ||
| सामाजिक, नागार्जुन | ||
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