नागार्जुन की काव्य चेतना

Vol-3 | Issue-08 | August 2018 | Published Online: 07 August 2018    PDF ( 120 KB )
Author(s)
Dr.Neetu Sharma 1

1Associate professor, Department of hindi, I.T College ,Lucknow (India)

Abstract

जनकाव्य या जनवादी काव्य के कई प्रयोग पिछले दशको में देखे गए है | इसकी एक धारा मार्क्स या माओ कि और है और दूसरी सर्वोदय-अन्त्योदय की ओर | इन अंतर्विरोधों में बिना पड़े हुए साँस-साँस में 'जन की व्यथा-कथा कहते रहने का जैसा स्तुत्य परस नागार्जुन में दीखता है, वैसा अन्यत्र नहीं | नागार्जुन मन-वचन-कर्म से जनवादी थे |' जनवाद उनका बौद्धिक व्यसन (मात्र बहस का मुद्दा) नहीं था, बल्कि भोगा हुआ जीवन दर्शन था | यह उन्हें अपनी प्रकृति परिवेश में और अपनी पैत्रक परम्परा से प्राप्त हुआ था | गरीबी की मार से आहत वे न जाने कैसी-कैसी पारिस्थितियो से टकराते रहे है | अव्यवस्थित और तारतम्यविहीन शिक्षा, जीविकोपार्जन के भांति-भांति के प्रयोग, पिता से मिली उपेक्षा स्वामी सहजानंद से मिली प्रेरणा हुआ, वह हिन्दी की जातीय संस्कृति की उपज थी, न कि दलीय मतवाद की | उनकी प्रतिभा प्राकृत प्रदत्त थी कवि स्वयं कहता है-

 

"मुझको भी मिली है प्रतिभा की प्रसादी, आटा, दाल, नमक, लकड़ी की जुगाड में...| अब कलम ही मेरा हल है, कुदाल है"

Keywords
जनकाव्य, अन्तः प्रवृति, जनजीवन प्रगतिशीलता
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