नवजागरण के स्त्री मुक्ति के प्रयासों के राह में ‘अभ्युदय‘ उपन्यास
| Vol-3 | Issue-11 | November 2018 | Published Online: 10 November 2018 PDF ( 137 KB ) | ||
| Author(s) | ||
रेखा रानी
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1शोधार्थी, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, मगध विश्वविद्यालय, बोधगया, बिहार (भारत) |
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| Abstract | ||
उन्नीसवीं शताब्दी में समस्त भारत में एक नवीन चेतना का प्रचार व प्रसार हुआ।इस नवचेतना को महावीर प्रसार द्विवेदी जी ने हिंदी नवजागरण का नाम दिया। हिंदी नवजागरण ने साहित्य में वैज्ञानिक सोच का विकास किया। देश की पुरानी रूढ़ियों, परंपराओं और मान्यताओं के वैज्ञानिक परीक्षण पर जोड़ दिया। इतना ही नहीं नवजागरण ने देश के सामाजिक, राजैनिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक पक्षों के यथार्थ को पूरी शिद्दत के साथ प्रस्तुत किया। नयी पीढ़ी के लेखकों के तर्कवादी दृष्टिकोणों की सहायता से भारतीय धर्म संस्कृति की पुनव्र्याख्या करवा, धर्म और समाज में रूढ़ होती परंपराओं का विरोध करवाया। भारतीय पुरूष-प्रधान समाज में भोगवाद, अन्याय एवं शोषण का शिकार बनती स्त्रियों के मुक्ति और उनके उत्थान में भी हिंदी नवजागरण ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्त्री-उत्थान के लिए जो आवाज नवजागरण काल में उठी, वह सदियों बाद और अधिक त्रीव वेग से हिंदी साहित्य में गुंजी है। हिंदी नवजागरण के आरंभिक दौर के उपन्यासों से लेकर वत्र्तमान के उपन्यासों में स्त्रियों से जुड़ी समस्याएँ विशेषकर सामाजिक लैंगिक विभेदीकरण की समस्याएँ सदैव से ध्यानाकर्षण का विषय बनी रही हैं। युग-युग से पीड़ित व प्रताड़ित स्त्री-जीवन के विभिन्न पहलुओं और स्त्री-पुरूषों की समानता एवं महिला सशक्तिकरण के मुद्दों को अनेक उपन्यासकार, मिथकों की सहायता से भी उठाते रहे हंै। वर्तमान साहित्य में उपन्यासकार नरेंद्र कोहली जी ने रामकथा पर आधृत अपने ‘अभ्युदय‘ उपन्यासद्वारा रामकथा के पौराणिक स्त्री पात्रों के माध्यम से अद्यतन नारी-जीवन के चित्रों को खींचने की कोशिश की है।नवजागरण काल के साहित्यों में स्त्रियों के समस्या और समाधानके लिए उठने वाली आवाज की गुंजनरेंद्र कोहली के ‘अभ्युदय‘ उपन्यास में भी सुनी जा सकती है। प्रस्तुत आलेख ‘अभ्युदय‘उपन्यास में उठाये गए आधुनिक स्त्री-समस्या और उनके मुक्ति की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। |
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| Keywords | ||
| हिंदी नवजागरण, नवचेतना, लैंगिक विभेदीकरण,समकालीन, महिला सशक्तिकरण। | ||
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