‘धूमिल’ की कविता में सामाजिक चेतना
| Vol-5 | Issue-11 | November-2020 | Published Online: 14 November 2020 PDF ( 114 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i11.034 | ||
| Author(s) | ||
| डॉ. श्रुति शर्मा 1 | ||
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1सह आचार्य, हिंदी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर |
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| Abstract | ||
मनुष्य समाज की एक प्रमुख इकाई है। वह समाज के सुख-दुःख आशा-निराशा, हर्ष-विषाद आदि सभी को अपने जीवन में आत्मसात् करता है। मनुष्य ही समाज की आत्मा है और समाज-उसका समष्टिगत रूप शरीर है। साहित्यकार मानव आत्मा का शिल्पी कहा जाता है। वह समाज की अखण्ड प्रतिभा के रूपाकार के लिए मानव को आलम्बन रूप में अपनाता है और अपने साहित्य में उसे चित्रित करता है। एक सच्चा कवि या साहित्यकार मानवीय उदारता, सहिष्णुता, प्रेम, मानव समानता आदि जीवनगत मूल्यों का समसामयिक संदेश देता चलता है। वह मनुष्य के जीवन की कशमकश को तोड़ देने वाली निराशाओं, कुंठाओं की उपेक्षा करके उनसे जूझने की शक्ति प्रदान करता है। इस प्रकार वह मनुष्य को उसके संकुचित दायरे से उठाकर सामाजिकता के परिवेश में बिठाकर उसके व्यक्तित्व का उन्नयन और विस्तार चाहता है। हर नये युग में जीवन-मूल्यों का नया संस्कार करके वह नया कल्प तैयार करता है। |
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| Keywords | ||
| साम्यवाद, अवचेतन, मानवीय उदारता, सहिष्णुता, कुंठा, जीवन-मूल्य। | ||
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