दन्त कथाओं में विद्यापति
| Vol-4 | Issue-01 | January 2019 | Published Online: 20 January 2019 PDF ( 132 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| स्वाति चौधरी 1; डाॅ. ब्रजलता शर्मा 2 | ||
|
1शोधार्थी मानविकी एवं हिंदी विभाग हिमालयन गढ़वाल विश्वविद्यालय 2शोधनिदेशक मानविकी एवं हिंदी विभाग हिमालयन गढ़वाल विश्वविद्यालय |
||
| Abstract | ||
महाकवि विद्यापति भारतीय साहित्य के अनूठे रचनाकार हैं। उनका जीवन-प्रसंग और रचना-विधान दन्तकथाओं से भरा पड़ा है। दन्तकथाओं के कारण उनका मूल्यांकन करते हुए कई बार लोग गलत निष्पत्ति भी निकालते रहे हैं। उनकी जीवनानुभूति और कौशल की उपेक्षा करते हुए उनके रचनात्मक उत्कर्ष में किसी दैवीय शक्ति का प्रबल योगदान समझते रहे हैं। जनश्रुति है कि स्वयं भगवान शिव, उगना नाम से उनके निजी सेवक के रूप में साथ रहते थे। अनुसन्धान के क्रम में पाया गया है कि उनकी रचनाएँ संस्कृत, अवहट्ट, मैथिली-तीन भाषाओं में उपलब्ध हैं। प्रसिद्ध ग्रन्थ हिन्दी साहित्य का इतिहास में प्रख्यात समालोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने काल विभाजन करते हुए विषय-बोध के स्तर पर जिन बारह ग्रन्थों को आधार मानकर आदिकाल का नामकरण वीरगाथाकाल किया था, उसमें दो ग्रन्थ विद्यापति के ही थे-कीर्तिलता और कीर्तिपताका। पर यह विचित्र रहस्य है कि बावजूद इसके विद्यापति को उन्होंने अपने साहित्येतिहास में एक अवतरण से अधिक जगह नहीं दे सकें। |
||
| Keywords | ||
| महाकवि विद्यापति कीर्तिलता कीर्तिपताका | ||
|
Statistics
Article View: 390
|
||

