डॉ0 भीमराव अम्बेडकर के धर्मिक विचारों का परिशीलन

Vol-6 | Issue-07 | July-2021 | Published Online: 15 July 2021    PDF ( 176 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i07.009
Author(s)
डॉ0 प्रशान्त उपाध्याय 1

1अस्टिेन्ट प्रोफेसर -प्राचीन इतिहास विभाग स्व0रामराज वर्मा महावि0 सारंगपुर, सुलतानपुर

Abstract

डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर के धर्म संबंधी विचारों का विश्लेषण सम्यक तरीके से नहीं हुआ है। इसके दो कारण हैं। पहला यह कि एक लंबे अर्से से भारत में धर्म पर विचार, केवल ‘हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न’ तक सिमट कर रह गया है और दूसरा, क्योंकि ‘प्रगतिशीलों’ ने हमेशा धर्म को नज़रअंदाज़ किया दृ उदारवादी यह कहते रहे कि धर्म, व्यक्ति का निजी मामला है और होना चाहिए और इसलिए उस पर सार्वजनिक विमर्श का कोई अर्थ नहीं है। माक्र्सवादियों का यह तर्क रहा है कि धर्म एक फरेब है, जो लोगों को उनके असली आर्थिक हितों को समझने से रोकता है। परंतु क्या हम इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं कि धर्म आज भी हमारी राजनीति और सामान्य लोगों की रोज़मर्रा की जिंदगी में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। उन्होंने खुलकर कहा कि ऐसा राष्ट्रवाद, जो देश के नागरिकों के एक बड़े तबके (अर्थात अछूतों) को अलग-थलग रखता है और उन्हें प्रताड़ित करता है, वह राष्ट्रवाद कहलाने लायक नहीं है। अम्बेडकर लिखते हैं कि धर्म, मानव समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा इसलिए है क्योंकि वह मानव जीवन के आधारभूत प्रश्नों से जुड़ा हुआ है जिनमें जन्म और मृत्यु, भोजन और रोग आदि शामिल हैं। परंतु यह कहने कि धर्म, मानव के अस्तित्व का भाग है, का यह अर्थ नहीं है कि सभी स्थानों और सभी कालों में धर्म मूलतः समान रहा है। सच्चाई इसके ठीक उलट है। अम्बेडकर का कहना था कि धर्म का इतिहास, क्रांतियों का इतिहास है और धर्म को समझने के लिए हमें पूरी दुनिया में उसमें आए भारी परिवर्तनों पर ध्यान देना होगा।

Keywords
बौद्ध धर्म ही सच्चा धर्म है और मैं ज्ञान, सद्मार्ग और करुणा के प्रकाश में जीवनयापन करूंगा।
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