ग्राम प्रशासन- मौर्य से मौर्योत्तर काल
| Vol-6 | Issue-07 | July-2021 | Published Online: 15 July 2021 PDF ( 293 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i07.010 | ||
| Author(s) | ||
डॉ रीतू तिवारी
1
|
||
|
1सहायक आचार्य (राजनीति विज्ञान) करामत हुसैन मुस्लिम गर्ल्स पी .जी कॉलेज, लखनऊ |
||
| Abstract | ||
भारत में ग्राम प्रशासन का इतिहास सदियों पुराना है । प्राचीन समय से ही यह ग्रामवासियों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक स्वतन्त्र प्रणाली के रूप में विकसित होने लगा था। ग्राम प्रशासन में निहित कल्याण की भावना ने सदैव ही इसकी उपादेयता को परिवर्तित परिस्थितियों के अनुसार सिद्ध किया है । यही कारण है कि ग्राम प्रशासन का यह स्वरूप और कार्य विभिन्न युगों की चुनौतियों के अनुसार परिवर्तित होता रहा है । वेदोत्तर काल में भी ग्राम प्रशासन की भूमिका में कोई कमी नही आयी बल्कि उसने एक सुव्यवस्थित स्वरूप को प्राप्त किया । वेदोत्तर काल में ग्राम और ग्राम भोजकों या ग्रामणीयों का महत्व स्वमेव सिद्ध है । मगध साम्राज्य के उदय के बाद जब अन्य प्रशासनिक संस्थाएं भी धीरे-धीरे अस्तित्व में आना प्रारंभ हो गई,तब भी इन ग्रामों का महत्व कम नहीं हुआ । कौटिल्य ने भी अपने ग्रन्थ अर्थशास्त्र में प्रचलित मौर्ययुगीन ग्राम प्रशासन का विस्तृत वर्णन किया है । उल्लिखित है कि मौर्यों ने ग्राम को को सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई के रूप में काफी महत्वपूर्ण स्थान दिया था जोकि मौर्योत्तर काल में भी एक महत्वपूर्ण इकाई के रूप में विद्द्य्मान रहे।यद्यपि परिस्थितियों के अनुसार उनके प्रशासन के स्वरूप में काफी परिवर्तन भी हुआ पर वे सदैव स्वायत संस्थाओं के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते रहे। |
||
| Keywords | ||
| ग्राम प्रशासन,वेदोत्तर काल, ग्राम भोजक, ग्रामणीयों, मगध साम्राज्य, स्वायत संस्थाएं | ||
|
Statistics
Article View: 449
|
||


