आंचलिक हिंदी पत्रकारिता में भाषा की स्थिति का अध्ययन

Vol-2 | Issue-7 | July 2017 | Published Online: 15 July 2017    PDF ( 230 KB )
Author(s)
सुदीप शुक्ल 1

1शोधार्थी, हिंदी विभाग, एस.एस.एल. जैन पीजी कॉलेज, विदिशा

Abstract

बीसवीं सदी के अंत तक सूचना एवं संचार माध्यमों के विकास और विश्वग्राम की संकल्पना ने भारत में मुख्यधारा की हिंदी पत्रकारिता के साथ आंचलिक हिंदी पत्रकारिता को भी बदल कर रख दिया है। परिवहन क्षेत्र में बढ़ी सुविधाओं से समाचार पत्रों के सुदूर निवासरत पाठकों तक पहुंचने की गति भी बढ़ी है। ऐसे में अब ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में भी लगभग मुख्य संस्करण के स्तर के समाचार पत्र पहुंच रहे हैं। इस सबके बावजूद समाचार पत्रों की भाषा भी बहुत प्रभावित हुई है। समाचार जिस अंदाज़ में लिखे जा रहे हैं उससे भाषा को नुकसान पहुंच रहा है। समाचार पत्रों की हिंदी अब एक अलग प्रकार की हिंदी का रूप ले रही है। यह खिचड़ी हिंदी अंग्रेजी के गैरजरूरी शब्दों से भरी पड़ी है। कठिनाई यह है कि यह भाषा आंचलिक क्षेत्रों के पाठकों की भाषा नहीं है। इसमें बोलियों की सुवास और अपनी भाषा होने का रस नहीं है। इसके पश्‍चात भी समाचारों का प्रस्‍तुतिकरण आमफहम भाषा के नाम पर इसी खिचड़ी भाषा में हो रहा है।

Keywords
हिंदी पत्रकारिता, विश्वग्राम, आंचलिक हिंदी पत्रकारिता, मुख्य संस्करण, खिचड़ी भाषा, आम फहम, भूमंडलीकरण, उपभोक्‍ता, बाजारवाद।
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