हठयौगिक ग्रन्थों में चक्रों का विवेचन

Vol-6 | No-01 | January-2021 | Published Online: 17 January 2021    PDF ( 141 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i01.014
Author(s)
डाॅ. ज्योति मलिक 1; सुमित 2

1शोध निर्देशक, सी.आर.एस.यू.,जीन्द

2रोल नं. 203475, एम.ए. योग (योग विज्ञान विभाग) सी.आर.एस.यू.,जीन्द

Abstract

चक्र एक संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है पहिया या घुमाना। भारतीय दर्शनों व योग में दृष्टि में चक्र प्राण या ऊर्जा के प्रारंभिक या केंद्र बिंदु माने जाते है जो नाड़ियों के मिलने के स्थल भी होते हैं। इनको स्थूल रूप में नहीं देखा जा सकता है। विभिन्न चिकित्सकों ने अपने शोध में चक्रों को शरीरस्थ देखने की कोशिश की है, लेकिन उनके द्वारा यह देखना संभव नहीं हो पाया, लेकिन वो ये भी नहीं कहते कि चक्र नहीं है चिकित्सकों ने शोध के आधार पर इनको माना है तथा ऊर्जा प्रवाह के केंद्र माने है व सुषुम्ना में इनका निवास स्थान माना है। इनको स्थूल दृष्टि से नहीं देखा जा सकता है। इनको देखने के लिए सूक्ष्म दृष्टि चाहिए अर्थात् महसूस किया जाता है व इनके जागने पर इनका स्थूल रूप में देखने को मिलता है। हमारे शरीर की तरह ही चक्र भी पंचमहाभूतों के बने होते हैं, चक्र विज्ञान कुण्डलिनी योग का एक महत्वपूर्ण विषय है। मूलाधार से मस्तिष्क तक इन चक्रों को शरीर धारण किए हुए हैं। कर्म यौगिक ग्रन्थों में चक्रों शरीर के कमल कहकर भी संबोधित किया है। ये चक्र हमारी प्रकृति, आहार, व्यवहार, विचार या अन्य शब्दों में कहे तो किसी भी मनुष्य के सामाजिक, मानसिक, भावनात्मक व आध्यात्मिक पक्षों को एक नया आयाम देते हैं। आज की पीढ़ी को आधुनिक शिक्षा के बाद इनकी जानकारी व्यर्थ लगती है। किन्तु आज विज्ञान भी इस बात को स्वीकार करता है कि चक्रों की उपस्थिति हमारे शरीर में है और जब हमारे चक्र एकरूप व खिले होते हैं तो हमारा मन व शरीर एक श्वास संतुलन के साथ कार्य करता है और तब हमारे शरीर में हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व में कमल की तरह एक श्वास खिलावट दिखती है। मुखमंडल पर एक अलौकिक तेज दिखता है। इन सभी चक्रों के बारे में ज्योतिष विद्या में भी बताया गया है। ये हमारे शरीर के सौरमंडल है। बाह्य सौरमंडल को तो सभी जानते भी हैं व इसका दर्शन भी कर सकते हैं परंतु आंतरिक सौरमंडल को देखने के लिए अपने अंदर झाँकना अत्यंत आवश्यक है और स्वयं में झाँकने का रास्ता योग-साधना से होकर जाता है। सूक्ष्मरूप में स्थित यह ब्रह्मांड हमारे शरीर में सात चक्रों के रूप में विद्यमान है। जो हम कर रहे हैं वो सही या गलत ये हम इन चक्रों को सक्रिय करके जान सकते हैं। वैसे तो नौ चक्र भी बताए है और नौ ग्रह भी बताए है, लेकिन हम राहु व केतु को छोड़ देगें तथा सात ग्रहों को सात चक्रों से जोड़ देगे।
चक्र स्वामी ग्रह
मूलाधार – मंगल ग्रह
स्वाधिष्ठान – बुध ग्रह
मणिपूरक – सूर्य ग्रह
अनाह्त – गुरू ग्रह
विशुद्ध – शुक्र ग्रह
आज्ञा – चंद्र ग्रह
सहस्त्रार – शनि ग्रह
इन सभी चक्रों को विभिन्न यौगिक ग्रन्थों – वेदों, उपनिषद् आदि में भी विस्तारपूर्वक बताया गया है तथा प्रस्तुत शोध-पत्र में हम ग्रंथों के चक्रों के महत्व पर प्रकाश डालेंगे।

Keywords
नाड़ियाँ, आध्यात्मिक, सौरमंडल, कोश, कुण्डलिनी।
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