सार्वभौमिक धर्म के लिए योग शिक्षा की भूमिका

Vol-3 | Issue-11 | November 2018 | Published Online: 10 November 2018    PDF ( 251 KB )
Author(s)
जयराम कुशवाहा 1; डॉ. उपेन्द्रबाबू खत्री 2; डॉ. शाम गणपत तीखे 3; डॉ. अखिलेश सिंह 4

1एम.फिल. (शोधार्थी) योग विभाग, साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय, बारला, रायसेन (म.प्र.)

2सहायक प्राध्यापक, साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय, बारला, रायसेन (म.प्र.)

3सहायक प्राध्यापक, साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय, बारला, रायसेन (म.प्र.)

4सहायक प्राध्यापक, साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय, बारला, रायसेन (म.प्र.)

Abstract

योग स्वयं कोई धर्म साम्प्रदाय या धर्म विषयक तत्वज्ञान नहीं है। प्रत्युत इस संसार के सभी धर्म साम्प्रदायोें को योग द्वारा यह षिक्षा मिलती है कि किस प्रकार अपनी-अपनी धर्मविषयक बातों में मन को एकाग्र करने से षान्ति और आनन्द प्राप्त होता है। सार्वभौमिक धर्म से तात्पर्य है कि जहाँ सभी धार्मिक साम्प्रदाय के मनुष्य समान भावना से व्यवहार करें। योग का अर्थ जोड़ना है। जहाँ सभी धार्मिक साम्प्रदाय आकर एकत्र भाव से जीवन को परमानंद से जोड़ने के लिए सर्वधर्मसमन्वय की बात कहते हैं। योग भी सम्पूर्ण मनुष्य जाति में एक ही आत्मतत्व को स्वीकार कर धर्म के आड़म्बर अर्थात् जाति-समुदाय आदि के भेद-भाव को मिटाकर सार्वभौमिक धर्म की नींव रखता है। वर्तमान जगत में फैली भ्राँतियों ने योग को किसी विषेष धर्म आदि से जोड़कर योग षिक्षा को सीमितता में बांध दिया है। योग षिक्षा मानव को मानवता का धर्म सिखाता है। पूर्ण रूप से स्वस्थ, आनंद एवं षान्तिपूर्ण जीवन जीने के कला या विज्ञान का नाम ही योग षिक्षा है। सार्वभौमिक धर्म में योग षिक्षा की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण ह,ै क्योंकि योग मानव को जीवन जीने की कला या युक्ति सिखाता है। योग किसी एक धर्म साम्प्रदाय जैसे बौद्ध, जैन, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसायी आदि से साम्यता नहीं रखता है। आज वर्तमान जगत में अनेक प्रकार की योग परम्पराएँ देखने को मिलती हैं। जैसे हठयोग, मंत्रयोग, लययोग, पाॅवरयोगा, प्रज्ञायोग, हाॅटयोगा आदि। यहाँ आक्षेप उत्पन्न होता है कि यह परम्पराएँ हिन्दूओं ने विकसित की है। इसीलिए योग हिन्दूवादी है, क्योंकि हठयोग में योग साधक षिव या षक्ति को आराध्य मानकर योग साधना करते हंै। या अन्य योग में भी वेद-उपनिषद आदि षास्त्रों की विधियों को मान्यता दी गयी है। परन्तु यह सत्य नहीं है। यह योग षिक्षा का पूर्ण ज्ञान नहीं है। लोगों ने अपने-अपने तरीकों से योग षिक्षा को अपनाकर उसे बढ़ावा दिया है। लेकिन यदि हम सार्वभौमिक दृष्टि से देखंे तो महर्षि पतंजलि जी का योगसूत्र जिसे राजयोग भी कहा जाता है। सम्पूर्ण विष्व के लिए समान रूप से योग की षिक्षा का ज्ञान देता है, क्योंकि महर्षि पतंजलि के योगसूत्र में कहीं भी किसी विषेष धर्म समुदाय, धार्मिकषास्त्र या भगवान (ईष्वर) आदि का वर्णन नहीं किया। अतः वह जानते थे कि लोग इसे किसी धर्म समुदाय से न जोड़ दे। इसीलिए महर्षि पतंजलि जी की योग षिक्षा सार्वभौमिक धर्म की मान्यता को स्पष्ट करती है। और सभी धर्म समुदायों एकता भाव से इस महान योग षिक्षा का ज्ञान दिया है।

Keywords
योगसूत्र, योग शिक्षा, सार्वभौमिक धर्म
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