समाजशास्त्र का अभ्युदय एवं विकास: सामान्य विवेचन

Vol-6 | Issue-07 | July-2021 | Published Online: 15 July 2021    PDF ( 167 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i07.028
Author(s)
डाँ बलवीर सेन 1

1सह-आचार्य (समाजशास्त्र) राजकीय महाविद्यालय, मेड़ता सिटी, नागौर (राज0)

Abstract

समाजशास्त्र के अभ्युदय तथा प्रगति के विकास को तीन कालखण्डों में विभाजित किया गया हैं। पहला, समाजशास्त्र का प्रगति काल जिसका समय लगभग 100 वर्ष 1750 से 1850 तक रहा। इसका प्रारंभ मानटेस्क्यू के सामाजिक चिंतन से काॅम्ट, स्पेन्सर तथा माक्र्स के सामाजिक चिंतन तक विस्तारित हैं। दूसरा, समाजशास्त्र का रचनात्मक-निर्माणात्मक काल। यह 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से प्रारंभ होता हैं तथा 20 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक विस्तारित रहा। इस समयावधि के सामाजिक चिंतक में हाबहाउस, दुर्खीम एवं मैक्स वेबर प्रमुख रहे हैं जिनकी कृतियाँ समाजशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र तथा पद्धित पर प्रकाश डालती है। तीसरा, समाजशास्त्र का उच्च व्यावसायिक एवं वैज्ञानिक स्तर। इसका प्रारंभ 1940-50 के दशक तथा उसके बाद का माना गया हैं। इसमें टालकट पारसंस, सी राइट मिल्स, बेरिंगटन मूरे प्रमुख है तथा जिनकी कृतियाँ समाजशास्त्र के विशिष्ट उपागमों पर प्रकाश डालती हैं। इस समयावधि में समाजशास्त्र का अध्ययन एवं अनुसंधान तीव्रतर गति से आगे बढ़ता हुआ देखा जाता हैं।

Keywords
विकास, अवधारणा, समाजशास्त्र, अभ्युदय ।
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