समकालीन कविता में काल संसक्ति और दुष्यन्त कुमार
| Vol-4 | Issue-03 | March 2019 | Published Online: 13 March 2019 PDF ( 98 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| कण्व कुमार मिश्र 1 | ||
|
1शोध छात्र हिन्दी विभाग अवधेश प्रताप सिंह, विश्वविद्यालय, रीवा (म.प्र.), भारत |
||
| Abstract | ||
श्री दुष्यन्त कुमार एक ऐसे कवि हैं, जो अपने परिचय का मोहताज नहीं हैं। कविवर दुष्यन्त कुमार समकालीन और नई कविता के पूर्णतः समर्थ कवि हैं। उनकी कविताएँ आधुनिक काव्य धारा अति विशिष्ट पहचानों को प्रस्तुत करने वाली है। उनमें न केवल युग बोध की व्यापक दृष्टि है, अपितु नई कविता के विविध आयामों के साथ-साथ व्यापक आक्रोश भी है निदा, फ़ाज़ली दुष्यन्त कुमार के विषय में लिखते हैं कि ‘‘दुष्यन्त की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के गुस्से और नाराज़ागी से सजी बनी है। यह गुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मों के खिलाफ़ नये तेवरों की आवाज थी जो समाज में मध्य वर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है। ’’ प्रस्तुत शोध-पत्र में दुष्यन्त कुमार की दृष्टि से समकालीन कविता में का संमकित पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। |
||
| Keywords | ||
| स्मकालीन आधुनिक काव्य दुष्यन्त कुमार | ||
|
Statistics
Article View: 767
|
||

