विवेचित लेखिकाओं के लेखन मंे स्त्री संवेदना एवं द्वन्द्व के विविध आयाम

Vol-4 | Issue-11 | November 2019 | Published Online: 16 November 2019    PDF ( 197 KB )
Author(s)
गिरजेश कुमार 1

1शोधार्थी हिन्दी विभाग राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय किशनगढ़, अजमेर (राज.)

Abstract

यह 21 वीं सदी का वह दौर है जो विविधता, बैचेनी, संवेदना से भरा हुआ है। आज की स्त्री लेखिका जीवन के सभी रंगों का सूक्ष्म रूप से लिख पढ़ रही है। स्त्री लेखिकाओं के लेखन को लेकर प्रश्न उठाये जाते हैं कि वह भावनाओं, संवेदनाओं, संबंधों, वासनाओं एवं विसंगतियों को ही अपने लेखन का केन्द्र बिन्दु बनाती है। ’’महिला रचनाकारों की लेखनी हिन्दी साहित्य को पूर्णता प्रदान करने मंे सक्षम है। जिन्होंने साहित्य के क्षेत्र में अपनी सेवायें प्रदान करने वाले रचनाकारों व नारी को अधिकतर मुख्य अंग बनाया है। नारी के संदर्भ में यह उक्ति प्रचलित है कि नारी को देवता भी नही समझ सके है। परन्तु एक नारी के लिए नारी को समझ पाना आसान होता है। इस कारण साहित्य जगत में नारी स्वरूपा साहित्यकारों का भी आना सार्थक हुआ। महिला साहित्यकारों ने नारी के मन के हर कोने में दबी हुई बातों को व चेष्टाओं का उद्धाटन करने में सफलता पाई है। देश की बदलती हुई सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों का असर समाज की महत्वपूर्ण कड़ी नारी पर भी पड़ा है। नारी के हृदय का सूक्ष्मज्ञान नारी के द्वारा प्रस्तुत किया जाना भी हृदय का सूक्ष्मज्ञान नारी के द्वारा प्रस्तुत किया जाना भी लेखन के क्षेत्र में उन दिनों एक नवीन सवा की भांति उद्धाटित हुआ था। वस्तुतः उपन्यास लिखने की प्रवृत्ति पुरूष साहित्यकारों की तुलना में देर से जागृत हुई परन्तु इनकी रचनाओं मे नारी जीवन की दुर्बलता एवं मानसिक, अधर्म साकार हो उठे हैं।’’1

Keywords
विसंगतियों, साहित्यकारों, सूक्ष्मज्ञान, प्रवृत्ति, मानसिक, वैश्वीकरण, मीडिया
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