विमुद्रीकरण के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव का एक समाजशास्त्रीय अध्ययन (छत्तीसगढ़ के रायपुर नगर के फुटकर व्यापारियों के विशेष संदर्भ में)

Vol-6 | Issue-03 | March-2021 | Published Online: 15 March 2021    PDF ( 245 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i03.010
Author(s)
Dr. Gajpal L.S. 1; Yadu Akhil 2

1Associate Professor & HOD, SOS Sociology and Social Work. Pt. Ravishankar Shukla University, Raipur, C.G.

2Research Scholar, Department of Sociology, Govt. J.Yoganandam Chhattisgarh College, Raipur, C.G.

Abstract

विमुद्रीकरण एक प्रक्रिया हैं, जिसमें शासन द्वारा प्रचलित मुद्रा अथवा चलित मूल्यवान खनिजों को कानूनी निविदा के आधार पर सार्वजनिक दोहन हेतु अमान्य कर दिया जाता हैं, यह प्रक्रिया तब अपनाई जाती हैं। जब एक निश्चित मुद्रा मूल्य, राष्ट्र में नियमित उपयोग में नही रहती, अथवा एक नई मुद्रा परिसंचरण में आती हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा राष्ट्र के नाम सम्बोंधित करते हुए, 8 नवम्बर 2016, को रात 8ः30 बजे विमुद्रीकरण की घोषणा की गई। जिसके तहत् मध्य रात्रि से 500 रूपयें एवं 1000 रूपयें के नोट भारत में कानूनी रूप से अमान्य (चलन से बाहर) घोषित कर दिए गए। स्पष्ट हैं कि उच्च मुल्य वर्ग की मुद्रा को प्रचलन से बाहर करने की प्रक्रिया अर्थशास्त्र की भाषा में विमुद्रीकरण (डिमाॅनेटाइजेशन) कहलाती हैं। इस अध्ययन का लक्ष्य फूटकर व्यापारियों के रोजमर्रा के व्यापार में आने वाली समस्या एवं विमुद्रीकरण से नवीन विचारों में उत्पन्न, होने वाले परिवर्तनों को समझना एवं इसके निवारण हेतु प्रयास करना हैं। यह शोधपत्र विमुद्रीकरण के दौरान सत्र 2016-17 में शोधार्थी द्वारा किए एम.फिल उपाधि हेतु (लघु शोध प्रबंध) के प्राथमिक तथ्यों पर आधारित हैं।

Keywords
विमुद्रीकरण, फुटकर व्यापारी
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