महिला सशक्तीकरण में पंचायतीराज का योगदान
| Vol-4 | Issue-02 | February 2019 | Published Online: 20 February 2019 PDF ( 313 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| संध्या सिंह 1 | ||
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1(शोध-छात्रा) समाजशास्त्र-विभाग राजा श्री कृष्ण दŸा स्नातकोŸार महाविद्यालय जौनपुर-उ0प्र0 |
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| Abstract | ||
सम्पूर्ण राष्ट्रीय विकास के सन्दर्भ में जिन मुख्य बिन्दुआंे पर विचार- विमर्श करना अत्यन्त ही आवश्यक है उन बिन्दुओं में महिला सशŸिाकरण का विषय संभवतः महत्वपूर्ण तथ्य है यद्यपि वैदिककालीन समय के परिप्रेक्ष्य मंे अध्यन किया जाय तो इस समय महिलाओं की प्रस्थिति उच्च थी तथा इन्हे धार्मिक समारोहों तथा शैक्षिक व अन्य क्षेत्रों में समान अधिकार प्राप्त था जिनमें कुछ प्रसिद्ध विदुषी महिलाएँ गार्गी, अपाला, घोसा आदि थीं। किन्तु मध्यकालीन समाज में अन्य कुरीतियों का विकास हुआ जिसके कारण महिलाओं की प्रस्थिति दिन प्रतिदिन दयनीय होती चली गयी जिसका कारण विदेशी आक्रमणकारी थे। जिनसे अपनी कन्याओ को सुरक्षित रखने के लिए पर्दा प्रथा तथा बाल विवाह जैसी कुरीतियों का विकास हुआ कम उम्र की लड़की/बाल विवाह से अन्य शारीरिक समस्याएँ उत्पन्न हुई और प्रसवावस्था के समय शरीर पूर्णरूप से परिपक्व न होने के का महिलाओं की मृत्यु हो जाती थी या किसी कारण यदि बाल साथी की मृत्यु हो जाती थी तो पूरे जीवन विधवा का जीवन व्यतीत करना तथा उन्हें अन्य सामाजिक रूढ़ियों एवं कुरीतियों का सामना करना पड़ता था तथा सती प्रथा जैसी अन्य कुरीतियाँ भी महिलाओं की प्रस्थिति दयनीय कर दी थी। यद्यपि स्वातंत्रयोŸार भारत मंे महिलाओं की स्थिति को सुधारने की दिशा में विविध विशेषकार 73वें संविधान संशोधन 1993 का अधिनियम मील का पत्थर सिद्ध हुआ जिसमें महिलाओं को 33ः की सहभागिता प्राप्त हुई जिसका उनके विकास मंे महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस संविधान (73वें) के पश्चात से अनेक प्रयास निरन्तर हुए है। 24 अप्रैल को ही पंचायती राज दिवस के रूप् में मनाया जाता है। |
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| Keywords | ||
| अंकेक्षण- लेखा-जोखा दोयम-दोहरा, द्वितीय भवितव्यता-नियति, भाग्य | ||
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