महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में राजाराम मोहन राय के विचारों का मूल्यांकन
| Vol-4 | Issue-03 | March 2019 | Published Online: 13 March 2019 PDF ( 117 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| कमल सिंह 1 | ||
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1शोधार्थी - इतिहास विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर |
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| Abstract | ||
इस तरह राजा राम मोहन राय ने हिन्दू समाज की कुरीतियों के घोर विरोधी होने के कारण 1828 में उन्होनें ब्रह्म समाज नामक एक नए प्रकार के समाज की स्थापना की तथा वे आजीवन रूढ़िवादी रिवाजों को दूर करने के लिए प्रयासरत रहे। उनके प्रयास आज भी सराहे जाते हैं। आज हम जिस युग में जी रहे हैं उसकी कल्पना समाज के महापुरूषों के बिना अधूरी है, इतिहास के कईं स्वर्णिम पलों पर हमें ऐसे महापुरूषों की कहानी पढ़ने के मिलेगी जिन्होनें अपनी क्षमता, दूरदर्शिता और सूझ-बूझ से देश को नई राह दी। ऐसे ही महापुरूषों में से एक थे - राजा राम मोहन राय। वे अपनी विलक्षण प्रतिभा से समाज में फैली कुरीतियों के परिष्कारक और ब्रह्म समाज के संस्थापक के रूप में निर्विवाद रूप से प्रतिष्ठित हैं। राजा राममोहन राय सिर्फ सती प्रथा का अंत कराने वाले महान समाज सुधारक ही नहीं, बल्कि एक महान दार्शनिक और विद्वान भी थे। राजा राममोहन राय आधुनिक भारत के रचयिता के नाम से जाने जाते हैं। वे ब्रह्म समाज के संस्थापक थे, जो भारत का समाजवादी आंदोलन भी था। सती की प्रथा को बंद कराने में उनकी अहम भूमिका रही है। राजा राम मोहन राय एक महान विद्वान और स्वतंत्र विचारक थे, जिनका नाम आज भी भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हैं और वे भारतीय पुनजार्गरण के संस्थापक युग पुरूष के रूप में प्रतिष्ठित हैं। |
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| Keywords | ||
| स्वर्णिम, दूरदर्शिता, कुरीतियों, परिष्कारक, पुनजार्गरण, महापुरूषों, देवदासियों, शरीरांत, व्यावहारिक-बोध, मुरालिस, परिचारिकाएँ। | ||
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