मत्स्य पालन से जुड़े परिवारों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति का अध्ययन (रायगढ़ जिले के विशेष संदर्भ में)
| Vol-6 | No-01 | January-2021 | Published Online: 17 January 2021 PDF ( 154 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i01.019 | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ. प्रेम शंकर द्विवेदी 1; ममता साहू 2 | ||
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1शोध निर्देशक, वाणिज्य एवं प्रबन्ध विभाग, डाॅ. सी. वी. रामन् विश्वविद्यालय करगीरोड कोटा, जिला बिलासपुर छ.ग 2शोधार्थी, डाॅ. सी. वी. रामन् विश्वविद्यालय, करगीरोड कोटा, जिला बिलासपुर छ.ग |
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| Abstract | ||
मछली एक बहुत ही पौष्टिक आहार एवं जैव प्रोटीन का एक सर्वोत्तम एवं सस्ता साधन है। आजकल विकसित तकनीकों की सहायता से मछली सभी दूर - दराज के क्षेत्रों एवं सात समुन्दर पार भी आसानी से उपलब्ध कराई जा सकती है । मारिस्यकी प्रौद्योगिकी का चैतरफा विकास हो रहा है एवं इस क्षेत्र में करोड़ों लोगों को प्रोटीनयुक्त भोजन प्राप्त हो रहा है, वहीं लाखों लोगों को इसके विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध भी हो रहा है और वे लाभान्वित हो रहे हैं। सामान्यतः मछली में प्रोटीन की मात्रा 14 से 24 प्रतिशत तक पायी जाती है एवं मछली के वसा में असंतृप्त वसीय अम्ल पाये जाते हैं। जो कि मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होते हैं। मछली में विटामिन ‘ए‘ एवं ‘डी‘ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है । मछली खनिज लवणों की अच्छी स्रोत हैं। इसमें कैल्शियम एवं फास्फोरस उपस्थित होता है। मछली के 100 ग्राम खाने योग्य ऊतकीय भाग से हमें 80 से 200 किलो कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। |
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| Keywords | ||
| मारिस्यकी प्रौद्योगिकी, असंतृप्त वसीय अम्ल, मछलियों के भण्डारण एवं भारतीय कृषि शोध संस्थान। | ||
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