प्रेमचंद के उपन्यासों में तत्कालीन परिवेश का यथार्थ चित्रण
| February-2016 | Published Online: 27 February 2016 PDF | ||
| Author(s) | ||
| Dr. Rekha Mishra 1 | ||
|
1Lecture (Hindi), Government College, Newai (Tonk), Rajasthan |
||
| Abstract | ||
प्रेमचंद ने अपने साहित्य के माध्यम से ग्रामीण और शहरी भारत की वास्तविकता को प्रकट किया है, जिसमें सामान्य लोगों के जीवन संघर्ष, आर्थिक कठिनाइयाँ, सामाजिक असमानताएँ, जातिवाद और महिला उत्पीड़न प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। उनके प्रमुख उपन्यासों जैसे गोदान, निर्मला और गबन में उस समय की आर्थिक परिस्थितियाँ, जैसे कि किसानों की स्थिति, ऋणग्रस्तता और जमींदारी प्रथा के प्रभाव, स्पष्ट रूप से देखने को मिलते हैं। प्रेमचंद का लेखन सामाजिक सुधार, मानवीय मनोविज्ञान और नैतिक चेतना पर भी बल देता है, जिससे उनका साहित्य समाज का प्रतिबिंब बन जाता है। उनकी सरल और सहज भाषा यथार्थवाद को और प्रभावशाली बनाती है तथा पाठकों को तत्कालीन सामाजिक और ऐतिहासिक परिवेश का सजीव अनुभव कराती है। यह अध्ययन दर्शाता है कि प्रेमचंद के उपन्यास केवल साहित्यिक कृतियाँ नहीं हैं, बल्कि वे समाज के ऐतिहासिक और सामाजिक दस्तावेज भी हैं, जो प्रारंभिक 20वीं सदी के भारत में व्यक्ति और समाज के परस्पर संबंधों की जटिलताओं को उजागर करते हैं। |
||
| Keywords | ||
| प्रेमचंद, यथार्थवाद, सामाजिक परिवेश, आर्थिक स्थिति, जातिवाद, महिला, ग्रामीण भारत, उपन्यास। | ||
|
Statistics
Article View: 81
|
||

