ज्योतिष शास्त्र की विवाह मेलापक में उपयोगिता
| Vol-4 | Issue-5 | May 2019 | Published Online: 25 May 2019 PDF ( 2 MB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ0 मुकेश शर्मा 1 | ||
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1प्राध्यापक, संस्कृत विभाग, डी.ए.वी. काॅलेज फॅार गल्र्ज, यमुना नगर;हरियाणा |
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| Abstract | ||
विवाह-संस्कार से पूर्व वर और कन्या का परस्पर कुल, शील, आयु, विद्या, वित्त, सनाथता एवं शारीरिक स्वास्थ्य का विचार प्राचीन काल से ही करने का प्रचलन है। इन सब तथ्यों के साथ एक महत्त्वपूर्ण परिपाटी है, वर-कन्या की जन्मकुण्डली का परस्पर मिलान। मेलापक विचार में अष्टकूट, दशकूट व मांगलिक आदि का सामान्य विचार प्राचीन काल से ही किया जाता रहा है। प्राचीन काल में इसका प्रचलन सम्भ्रान्त व शिक्षित वर्ग में ही किया जाता था परन्तु परिवर्तित सामाजिक परिवेश में मेलापक का प्रचलन प्रायः सर्वत्रा दृष्टि गोचर होता है। मेलापक के महत्त्व की पराकाष्ठा ही है कि चाहे व्यक्ति की पृष्ठभूमि किसी सम्प्रदाय की हो। वह अवसर मिलने पर अपने दाम्पत्य सम्बन्ध् को जानने के लिए उत्सुक रहता है। ऐसे उत्सुक प्रश्नार्थी के लिए ज्योतिषशास्त्रा बहुत सहायक है। ज्योतिषीय-दृष्टिकोण से भावी वर-वध्ू के स्वभाव हेतु प्रथम भाव, पारिवारिक सुख के लिए द्वितीय भाव, चतुर्थ भाव से गृहस्थ में शान्ति, पंचम से सन्तान, षष्ठ से रोग, सप्तम एवं द्वादश से दाम्पत्य सुख, अष्टम से आयु, नवम से भाग्य, दशम से प्रतिष्ठा तथा एकादश से इच्छापूर्ति का विचार करना चाहिए। कारक विचार के अन्तर्गत शुक्र, बृहस्पति का विचार तथा ग्रह युति का विचार अनिवार्य है। नवमंाश कुण्डली वैवाहिक दृष्टिकोण से विशेष ध्यातव्य है। षोडशवर्ग का विचार भी सूक्ष्म फलादेश में सहायक हैं। सुख-दुःख की अवध् िकी जानकारी दशा एवं गोचर पर आधरित है। उपर्युक्त तथ्यों के साथ प्रयुक्त ज्योतिषशास्त्रा वैवाहिक जीवन में आने वाली समस्त सुखद एवं दुःखद परिस्थितियों को स्पष्टरूपेण उद्घाटित करता है। |
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| Keywords | ||
| वर और कन्या का परस्पर कुल, शील, आयु, विद्या, वित्त, सनाथता | ||
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