छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति में गोदना कला के स्वरुप में परिवर्तन का अध्ययनः सरगुजा जिले के संदर्भ में

Vol-4 | Issue-04 | April 2019 | Published Online: 15 April 2019    PDF ( 602 KB )
Author(s)
बैनर्जी शिप्रा 1; ताम्रकार ऋचा 2

1सहायक प्राध्यापक, गृह विज्ञान विभाग, षास. दू.ब. महिला महाविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत।

2शोध छात्रा, गृह विज्ञान विभाग, षास. दू.ब. महिला महाविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत।

Abstract

गोदना छत्तीसगढ़ की एक पारंपरिक लोक कला है। जनजातीय संस्कृति में विभिन्न अंगो के लिये धातु के आभूषण तो इसमें प्रचलित हैं ही, चित्राकृतियों का अलंकरण भी विद्यमान है। इस अलंकरण को जन सामान्य की भाषा में ’गोदना’ कहा जाता है। इस कला में विभिन्न आकृतियों को स्थायी रूप से शरीर पर अंकित किया जाता है। जनजातीय जीवन में, गोदना शारीरिक सुंदरता के साथ ही साथ कई सामाजिक व आध्यात्मिक कारणों के लिये बनवाया जाता है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में गोड़ जनजाति की महिलाओं द्वारा अब कपड़ो पर भी गोदना की आकृतियां बनाया जाने लगा है। प्रस्तुत अध्ययन में गोदना के स्वरूप के इसी परिवर्तन के बारे में अध्ययन किया गया है तथा यह पाया गया कि इस प्रकार गोदना कला का अनुप्रयोग करने से इस कला को संरक्षण तो प्राप्त हो ही रहा है साथ ही साथ नवीनता व लाकप्रियता भी प्राप्त हो रही है।

Keywords
गोदना, गोंड जनजाति, वस्त्र
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