ग्रामीण नारी जीवन संदर्भ: ‘पंचमी तत्पुरुष’

Vol-6 | Issue-09 | September-2021 | Published Online: 15 September 2021    PDF ( 1,023 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i09.018
Author(s)
लक्ष्मी देवी 1

1पीएच.डी. शोधार्थी, हिन्दी विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू - 180006

Abstract

भारत में आज भी पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तरों पर स्त्रियों की स्थिति पुरुषों की अपेक्षा हीन और कमजोर है। महिलाओं को सषक्त बनाने, उनकी क्षमताओं और कौषल का विकास करने हेतु विभिन्न योजनाएँ चलाई जा रही हैं। इन योजनाओं से शहरी महिलाएँ तो पूर्ण रूप से लाभान्वित हुई हैं। परन्तु आज भी अधिकांष ग्रामीण महिलाएँ निरक्षरता एवं जागरुकता की कमी के कारण परिवार और समाज में आर्थिक रूप से सपन्न महिलाओं के समक्ष उपेक्षा ही पा रही हैं। रामधारी सिंह दिवाकर के उपन्यास ‘पंचमी तत्पुरुष’ में ऐसी ही ग्रामीण नारी का चित्रण मिलता है। जिसे शहरी सुख-सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। तथा उसे पति के द्वारा ही उसे ग्रामीण नारी कहकर धिक्कारा जाता है। महिलाएं, परिवार, समाज व देष की उन्नति की नींव हैं और नींव को सषक्त व मजबूत बनाये जाने पर ही सुदृढ़ विषाल एवं भव्य इमारत की कल्पना को साकार किया जा सकता है। ग्रामीण नारी की दुर्दषा का सबसे बड़़ा कारण षिक्षा का अभाव है। नारी के लिए आवष्यक है कि वह समाज में अधिक-से-अधिक षिक्षित होकर और अपने अधिकारों के प्रति जागरुक होकर अपनी अस्मिता को बनाने में सक्षम हो तभी वह समाज में निरन्तर प्रगति की ओर अग्रसर होती हुई नज़र आएगी।

Keywords
निरक्षरता, सषक्त, भव्य, सुदृढ़, सक्षम।
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