आदी समुदाय की अस्मिता और “दोन्यी-पोलो”

Vol-4 | Issue-7 | July 2019 | Published Online: 15 July 2019    PDF ( 215 KB )
Author(s)
ईङ परमे 1; डॉ. ओकेनलेगो 2

1शोर्धाथी हिन्दी विभाग, राजीव गांधी विश्वविद्यालय ईटानगर सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग , जवाहरलाल नेहरु महाविद्यालय पासीघाट, अरुणाचलप्रदेश

2प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, राजीव गांधी विश्वविद्यालय ईटानगर, अरुणाचलप्रदेश

Abstract

समकालीन समाज में अस्मिता विर्मश एक गंभीर प्रश्न है । दुनिया के लगभग प्रत्येक समुदाय अस्मिता के आधारशिलाओं को समझने एवं पहचानने में लगे हुए हैं । इस तरह अस्मिता विर्मश एक असमाप्त प्रक्रिया बन पड़ी है। आज आदिवासी विर्मश का स्वर काफी तेजी से उभर रहा है। यह समाज अजनबीपन की परिस्थिति में हैं , अतः संषर्घशील है। भौगोलिक स्थिति ,संस्कृति , धर्म , आदि जनजातीय अस्मिता को निरुपित करते हैं ।  पूर्वोत्तर भारत विशेषकर अरुणाचल प्रदेश की पहचान एक जनजातीय बहुल भौगोलिक क्षेत्र के रुप में हैं। अरुणाचल प्रदेश में आदी,आपातानी,गालो सहित 25 प्रमुख जनजातियाँ है जो अपनी जातिगत विशिष्टाओं द्वारा पहचानी जा सकती है । अरुणाचल प्रदेश की  आदी जनजाती की पहचान जाति, वंश,धर्म आदि से होती हैं । ‘धार्मिक पहचान’ का प्रश्न केवल जनजातीय समाजों में ही सीमित नहीं हैं,इसकी व्यापक महत्ता हैं । आदीसमाज धर्म के संर्दभ में काफी उदार हैं; लेकिन इनका अपना एक मूल धर्म भी है -‘दोन्यी –पोलो’ । दोन्यी-पोलो का अर्थ है सूर्य और चन्द्रमा । स्पष्ट हैं कि ये समाज प्रकृति पूजक है। दोन्यी-पोलो सूर्य और चन्द्रमा के आराधना पर केन्द्रित हैं जिसमें सम्मिलित हैं पारंपरिक विश्वास, अनुष्ठान , मूल्य आदि । इन अनुष्ठानों ,विश्वासों, मूल्यों के संघटित रुप हैं ‘दोन्यी –पोलो’ । किस तरह एक धर्म किसी व्यक्ति या समाज की अस्मिता को आकार देता है इसका विश्लेषण प्रस्तुत आलेख में किया जाएगा । किस तरह यह अल्पसंख्यक धर्म महज एक धर्म नहीं अपितु  आदी समाज की अस्मिता के रुप में विकसित हुआ है उसका अध्ययन प्रस्तुत आलेख  का मूल स्वर है। अध्ययन  एवं शोध से इस बात का प्रमाण देते हैं  कि दोन्यी –पोलो आदी समाज के जीवन के प्रत्येक पक्षों को प्रभावित करतें हैं , जो आदी लोकसाहित्य में  भी सशक्त रुप से प्रतिबिम्बित होते हैं। आदी समाज  का अपना विशिष्ट इतिहास , संस्कृति , दर्शन , सामाजिक व्यवस्था आदि होते हुए भी तथाकथित मुख्यधारा का समाज आदी जनों से  लगभग अपरिचित हैं ।  दुनिया से हटकर आदी समाज का विकास असंभव हैं । राष्ट्रीय एवं अंर्तराष्ट्रीय विकास की दौर से आदी समुदाय भी अछूता नहीं है । त्वरित विकास की दौर में इस बात की आशंका स्वाभाविक है कि निकट भविष्य में आदी जनजाति*- की अस्मिता जो दोन्यी –पोलो धर्म से जुड़ी हुई  है अपने मूल स्वरुप को खो देगी । अत: लोकसाहित्य के क्षेत्र में प्राथमिकता के आधार पर उसके संरक्षण की आवश्यकता है । अपनी पहचान को कथित मुख्यधारा के समक्ष हमें स्वयं उभारना होगा । दुनिया के साथ चलकर ही आदी जनजाति का विकास हो पाएगा ।

Keywords
अङोताकार,आबाङ, आदी जनजाति, केपेल, तानी,दोन्यी-पोलो, मीरी ।
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