उस्ताद शाहिद परवेजजी की वादन शैली
| SL-RCTRM-2018 | Special Issue | OCT-2018 | Published Online: 20 October 2018 PDF ( 137 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| भगवंत कौर 1 | ||
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1पीएच॰ डी॰शोधार्थी संगीत विभाग पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ । |
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| Abstract | ||
संगीत मनुष्य के भावों की अभिव्यक्ति का अनुपम माध्यम है। जब से मनुष्य ने संगीत का साक्षात्कार किया और उसे अपनी भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया । तभी से अनुसंधान की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई । प्रारम्भिक इतिहासिक ठोंस प्रमाण तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन वैदिक साहित्य में संगीत के सुव्यवस्थित रूप का जो वर्णन मिलता है,वह वैदिक ऋषियों की खोज का ही प्रतिफलन है। यही परम्परा आगे प्रचलित रही । भरत ने प्रत्यक्ष घोषणा की है कि संगीत नाट्य का अभिन्न अंग है और नाटय वेद की रचना उन्होंने वेदों के आधार पर ही की है । इस बात का स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि ऋग्वेद से पाठ, यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से संगीत तथा अथर्ववेद से रस लेकर ब्रह्मा ने ‘पंचम वेद’ यानि ‘नाट्य शास्त्र’ की रचना की । यह प्राचीन ऋषियों की खोज का ही परिणाम है जो नाटय शास्त्र में सात स्वर, बाईस श्रुतियां और श्रुतियों की सिद्धि के लिए चतुश सारणा, ग्राम संरचना के सिद्धांत, मुच्छना, तान, जाति, ताल और नाना प्रकार के वाद्यों का वर्णन यह सब अपने-आप नहीं हुए बल्कि साधकों के कठिन परिश्रम और अनुसंधान के कारण ही हुए है। समय≤ पर गायन तथा वादन शैलियों में आए हुए परिवर्तन तथा उनसे संबंधित तकनीकों का विकास जहां एक तरफ संगीत के विकास को दिखाता है वही दूसरी तरफ निरंतर चलने वाली अनुसंधान की प्रक्रिया की ओर भी संकेत करता है ।
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| Keywords | ||
| संगीत मनुष्य इतिहासिक वैदिक ऋषि | ||
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