विषमताओं के युग में आत्मशक्ति का संचरण करती कविता: राम की शक्ति-पूजा
| Vol-4 | Issue-02 | February 2019 | Published Online: 20 February 2019 PDF | ||
| Author(s) | ||
| अर्चना यादव 1 | ||
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1सहायक प्रवक्ता, हिन्दी विभाग इन्दिरा गाँधी विश्वविद्यालय मीरपुर, रेवाड़ी |
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| Abstract | ||
साहित्य मनुष्य जीवन की भावनाओं, कल्पनाओं, संवेदनाओं, ज्ञान आदि का संचित कोष होता है। साहित्य के माध्यम से ही मनुष्य जीवन में सच्चरित्रता आती है। यह सच्चरित्रता मनुष्य को आनन्द प्रदान करती है। इस दृष्टि से भारतीय साहित्य को देखा जा सकता है। जिसमें मानव-समाज के लोकमंगल की उदात्त भावना विद्यमान है। साहित्य में आदर्श भावना जीवन को उसी रूप में प्रभावित करती है। अपने उत्कर्ष के लिए जीवन जो उपादान ग्रहण करता है, उन्हें साहित्य भी अपनाता है। इससे साहित्य में मनुष्य की जीवनानुभूतियों का स्वतः समावेश हो जाता है। समाज की प्रत्येक गतिविधियों से साहित्यकार परिचित होता है। इसलिए मानव जीवन के प्रत्येक पहलू की अनुभूति साहित्य में होती है। आधुनिक काल के छायावादी कवियों में सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का नाम सर्वोपरि है। इन्होंने अनामिका, परिमल, गितिका, तुलसीदास, कुकुरमुक्ता, अणिमा, बेला आदि प्रसिद्ध रचनाएँ लिखी है। राम की शक्ति-पूजा इनकी प्रमुख कविता है। इन्होंने सरोज-स्मृति, राम की शक्ति-पूजा व तुलसीदास नामक तीन लम्बी कविताएं लिखी हैं। इन सभी रचनाओं में मनुष्य जीवन के किसी न किसी पहलू को उजागर किया गया है। निराला की राम की शक्ति-पूजा नामक कविता जीवन में कभी भी हार न मानने का संदेश देती है। |
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| Keywords | ||
| साहित्य, आत्मशक्ति, संचरण, विषमता, भारतीय संस्कृति, पाश्चात्य संस्कृति, त्याग, संयम, सहनशीलता, विश्वबन्धुत्व, मानसिक द्वन्द्व। | ||
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