महात्मा गाँधी के ट्रस्टीशिप एवं स्वराज संबंधी विचारों का सामान्य विश्लेषण

Vol-6 | Issue-02 | February-2021 | Published Online: 14 February 2021    PDF ( 143 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i02.027
Author(s)
Dr. Pankaj Bhardwaj 1

1Research Scholar and Asst. Professor (Political Science), Sanskar Bharti, P.G. College, Bagru, Jaipur

Abstract

मूल प्रश्न यह है कि क्या अहिंसात्मक ढंग से सामंती तथा बुर्जआ समाज की सामाजवादी समाज में बदला जा सकता है ? गाँधी को इस परिवर्तन में पूर्ण आस्था थी क्योंकि उनको मनुष्य की स्वाभाविक सदाशयता में विश्वास था। गाँधी सत्य और अहिंसा के द्वारा ही सामाजिक प्रेम, सद्भाव लाना चाहते थे। विश्वबन्धुत्व की भावना को उत्पन्न करने में अहिंसा को सबसे प्रमुख तत्व मानते थे। सामाजिक और आर्थिक समानता में उनका पूर्ण विश्वास था। इसके संबंध में संदेह नहीं किया जा सकता पर अहिंसात्मक ढंग से आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों के बल पर यह सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित की जा सकती है। इसकी स्थापना करना भविष्य के गर्भ में है। इतना तो सत्य है कि गाँधी ने शुद्ध भौतिकवादी और मात्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सामाजिक समस्याओं का हल नहीं ढूंढ़ा वरन् आध्यात्मिक तथा नैतिक दृष्टिकोण को भी उसमें संश्लिष्ट कर दिया जिसके कारण उनका दृष्टिकोण समन्वयवादी हो गया जिसको वामपंथी इतिहासकार समझौता परस्त कहते है। जबकि गांधी राज को हिंसा का प्रतीक मानते है और राज्य की समाप्ति पर बल देते है। गांधी जी द्वारा दिये गये ट्रस्टीशिप, स्वराज एवं राज्य संबंधी विचार प्राथमिक रूप से विलक्षण प्रतीत होते है।

Keywords
ट्रस्टीशिप, स्वराज, राज्य, अहिंसा, सत्य।
Statistics
Article View: 397