समकालीन हिंदी कहानी के आंदोलन की समीक्षा
| Vol-6 | Issue-05 | May-2021 | Published Online: 15 May 2021 PDF ( 280 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i05.017 | ||
| Author(s) | ||
डॉ हरि किशोर यादव
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1पी.एच-डी हिंदी, विभाग पटना वि.पटना |
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| Abstract | ||
समकालीन कहानी परिदृश्य की प्रवृति बौद्धिकता के स्तर पर सामाजिक अंतरविरोध - सातवे , दशक में हैं।जिसमें भौतिक विकास, मूल्यों की उपेक्षित करते हुए आम लोगों की जीवन के अनेक तरह के अन्तर्विरोधों की अभिव्यक्ति हुई है । वैश्विकरण की दौड़ में आम लोगों में की छटपटाहट उपस्थित है। आज वर्तमान समय में समाज की सभ्यता, राजनिति, संस्कृति, संघ संवेदना, अर्थव्यवस्था, कला, नाटक,सिनेमा , यौन चिंतन, आदि अनेक स्तर पर तेजी से परिवर्तन लक्षित हो रहे हैं, समकालीन हिंदी कहानियाँ अपने समकालीन समय की प्रवृति के विभिन्न आयामों के उद्यघाटन के लिए इस आंदोलन का प्रयोग किया, जो सातवे दशक और आगे के लेखक का नाम आते हैं :- महिप सिंह, असगर वजाहत, सिद्धयेश, प्रकाश बाथम, सुदर्शन, नरग, ह्रकेश, धनु मिश्र, हर्षनाथ, श्रवण कुमार, सृजय, संजीव,मधुकर सिंह, उदय प्रकाश महिलाओं में ममता कालिया, मन्नू भंडारी, सुधा अरोड़ा, निरुपमा सेवती, दीप्ती खांडेवाल आदि ऐसे अनेक कथाकर है,जो समकालीन आंदोलन की रचना- प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में उसके सामाजिक, राजनैतिक, पारिवारिक, इन सारी विसंगतियों को उजागर करने की उपलब्धि है। |
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| Keywords | ||
| समाज की सभ्यता, राजनिति, संस्कृति, संघ संवेदना, अर्थव्यवस्था | ||
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