बौद्ध दर्शन में सत्ता के स्तरीकरण का ऐतिहासिक सर्वेक्षण
| Vol-6 | Issue-03 | March-2021 | Published Online: 15 March 2021 PDF ( 209 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i03.016 | ||
| Author(s) | ||
विवेक कुमार पाण्डेय
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1शोधार्थी, दर्शनशास्त्र विभाग, डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) |
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| Abstract | ||
बौद्ध दर्शन अपने प्रारम्भिक रूप से ही बुद्धि की स्वतंत्रता को लेकर अग्रसर हुआ है। बौद्ध मतावलंम्बियों को यह विवेक कि स्वतंत्रता बुद्ध के द्वारा दिये गये उस वचन से है, जिसमें बुद्ध इस बात को कहते है कि ‘मेरे द्वारा दिये गये किसी भी उपदेश को आस्था के रूप में नहीं स्वीकार करना बल्कि उसकी परीक्षा करके ही स्वीकार करना। बुद्ध के इसी आदेश को ग्रहण करके, बौद्ध मत अपने दार्शनिक मत को विकसित करते हैं। बुद्ध देशना के व्याख्यापरक भेद के आधार पर ही बौद्ध दर्शन विभिन्न प्रस्थानों में विभक्त हुआ। व्याख्या के इस मूल में सत्ता विषयक प्रश्न सभी बौद्ध प्रस्थानों में समान रूप से उपस्थित रहें। सत्ता के सन्दर्भ में बौद्ध प्रस्थानों में जो अन्तर दिखाई पड़ता है, वह बुद्ध वचनों में पूर्व में ही विद्यमान है। बौद्ध प्रस्थानों में परमार्थ और व्यवहार की सत्ता का जो स्वरूप हमें देखने को मिलता है, वह निश्चित रूप से बौद्ध दर्शन के सर्वांगीण विकास में एक महत्वपूर्ण योगदान रखता है। |
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| Keywords | ||
| बौद्ध दर्शन, बौद्ध प्रस्थान, सत्ता, स्तरीकरण। | ||
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