हिन्दी के प्रारंभिक उपन्यासों में चित्रित परिवार

Vol-2 | Issue-3 | March 2017 | Published Online: 23 March 2017    PDF ( 183 KB )
Author(s)
डॉ. मनीषा शंखवार 1

1सहायक प्रोफेसर, लक्ष्मीबाई महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

Abstract

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और मनुष्य को समाज में स्थान दिलाने में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण होती है । परिवार को सार्वभौमिक एवं शास्वत प्राथमिक समूह भी कहते हैं । आदिम मानव सभ्यता से लेकर वर्तमान के आधुनिक मानव सभ्यता तक परिवार के महत्व को सभी ने स्वीकार किया है । परिवार में जन्म लेकर शिशु मां के स्नेह एवं पिता के संरक्षण के बीच एक सभ्य नागरिक बनने की ओर कदम बढ़ाता है । परिवार ही वह प्रथम पाठशाला है जहां शिशु के सामाजिक और मानवीय गुणों का विकास होता है । परिवार किसी भी समाज की प्राथमिक इकाई होता है । मनुष्य का जन्म परिवार में होता है उसकी बाल्यावस्था परिवार में ही गुजरती है । यहीं वह चलना-फिरना और बोलना सीखता है । परिवार जनजातीय समुदायों के साथ-साथ ग्रामीण और शहरी समाजों में भी पाया जाता है । यह सभी समाजों में पाया जाता है । यही कारण है कि कहा जाता है कि परिवार में सार्वभौमिकता पाई जाती है । परिवार का भावात्मक रूप एक दूसरे को जोड़े रखता है । इसके सदस्य भावात्मक आधार पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं । परिवार में पति-पत्नी के बीच यौन संबंधों की पूर्ति होती है, बच्चों का पालन-पोषण होता है तथा उन्हें माता-पिता का संरक्षण प्राप्त होता है । यहाँ हिन्दी के उपन्यासों के माध्यम से भारतीय परिवार व्यवस्था के स्वरूप को समझने का प्रयास करते हैं ।

Keywords
परिवार, प्रारम्भिक उपन्यास, भारतीय समाज, पाश्चात्य समाज।
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