हिन्दी साहित्य की काव्यात्मक सृष्टि में गीतिनाट्य परम्परा
| Vol-3 | Issue-12 | December 2018 | Published Online: 10 December 2018 PDF ( 192 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ0 अशोक कुमार 1 | ||
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1उच्च माध्यमिक शिक्षक |
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| Abstract | ||
भारतीय वाड़मय में गीति-नाट्यों का सदैव एक विशिष्ट स्थान रहा है तथा इसकी परम्परा अति प्राचीन है। गीतिनाट्य नाट्य साहित्य की काव्यात्मक सृष्टि है। भारतीय काव्य सिद्धान्तों में नाटकों को ‘पंचम वेद’ के नाम से पुकारा गया है। ‘नाट्योपंचमवेदः‘ कहकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि नाटक के सभी प्रमुख अंग वेद से ही गृहीत हैं। इसे कभी काव्य नाटक, काव्य रूप तो कभी दृश्य काव्य कहा गया। दृश्य काव्य होने के कारण यह पाठ्य और अभिनय दोनो है। यह सर्वविदित है कि अभिनय मानव की आदिम प्रवृति है। भारतीय संस्कृति और लोक परम्परा में तीन प्रवृतियाँ विशेष रूप से दिखायी देती है वे हैं- गीत, संगीत और अभिनय। गीति-नाट्यों में ये तीनो प्रवृतियाँ स्पष्ट रूप से मौजूद है। |
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| Keywords | ||
| विशिष्ट, प्रवृति, अभिनय | ||
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