कौटिल्यकालीन राज-व्यवस्था में वैदेशिक संबंध
| Vol-3 | Issue-10 | October 2018 | Published Online: 10 October 2018 PDF ( 1 MB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ. रेणु सिंह 1 | ||
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1(+2 शिक्षिका) राजनीति विज्ञान श्री रामलखन सिंह यादव सर्वोदय उच्चतर माध्यमीक विद्यालय पुनाईचक पटना -23 |
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| Abstract | ||
कौटिल्य का अर्थषास्त्र राज-व्यवस्था संबंधी महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें समस्त राजनीतिक को समाहित किया गया है। इसमें समस्त राजनीतिक विचारों को समाहित किया गया है। यह ग्रंथ एक ओर तो राज्यषास्त्र संबंधी सिद्धांत का उल्लेख करता है तो दूसरी ओर राज-व्यवस्था अथवा प्रषासन संबंधी व्यावहारिक निर्देष देता है। राजनीतिक विचारक के रूप कौटिल्य ने न केवल राज्य के आंतरिक प्रषासन के सिद्धांतो का वर्णन किया है। उसके अनुसार एक राज्य द्वारा दुसरे राज्यों के साथ अपने संबंध निर्धारित किए जाने चाहिए। उसने विदेषों में राजदूत और गुप्तचर रखने के विशय पर भी विचार किया है। कौटिल्य ने दूसरे राज्यों के साथ व्यवहार संबंध में दो सिद्धांतों का विवेचन किया पड़ोसी राज्यों के साथ संबंध स्थापित करने के लिए मण्डल सिद्धांत और अन्य राज्यों के साथ व्यवहार निष्चित करने के लिए शाड्गुण्य नीति। |
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| Keywords | ||
| मण्डल, संधि, विजिगीशु राजा, अन्ंतर्राज्य, दूतों, राजनय, शाड्गुण्य सिद्धांत। | ||
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