ग्रामीण क्षेत्र की अनुसूचित जाति की महिलाओं के सामाजिक परिवर्तन में शिक्षा का प्रभाव: एक समाजशास्त्रीय अध्ययन (तहसील द्वारा हाट के विशेष संदर्भ में)
| Vol-5 | Issue-9 | September-2020 | Published Online: 15 September 2020 PDF ( 136 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i09.011 | ||
| Author(s) | ||
योगेश मैनाली
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1शोधार्थी, समाजशास्त्र विभाग, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल, उत्तराखण्ड |
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| Abstract | ||
भारत में शिक्षा का महत्व प्राचीनतम सभ्यताओं से चला आ रहा है। जिसमें शिक्षा की पहली किरण देखी, रची और संजोयी गयी थी। यह शिक्षा चाहे आदिम जमाने की खेती से लेकर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की तकनीक की हो, जीवन व्यवहार के प्रतिमानों की हो, सामाजिक सम्बन्धों की हो या समाज को जानने की हो। भारत को शिक्षा का पालना कहा जाता है। भारत की आत्मा गाँवों में निवास करती है तथा गाँवों में रहने वाले लोग परम्परावादी होते हैं। आज गाँवों का नगरों से जुड़ने के कारण गाँवों में सदियों से चली आ रही संकीर्ण जाति व्यवस्था में परिवर्तन की प्रक्रिया के सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र की अनुसूचित जाति की महिलाओं में शिक्षा से पड़े प्रभावों का ही परिणाम है कि उनके सामाजिक जीवन के साथ-साथ खानपान, रहन-सहन, व्यवहार प्रतिमानों एवम् उनकी प्रस्थिति में परिवर्तन दिखाई देते हैं। यह कहना अतिश्योक्ति न हो गया कि ग्रामीण क्षेत्र की अनुसूचित जाति की महिलाओं में परिवर्तन लाने, उनमें आत्म-विश्वास की चिंगारी पैदा करने, समाज की मुख्यधारा से जोड़ने तथा उनकी सामाजिक स्थिति में उन्हें सम्मान दिलाने में शिक्षा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। |
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| Keywords | ||
| ग्रामीण क्षेत्र, अनुसूचित जाति की महिलाएं, सामाजिक परिवर्तन, शिक्षा का प्रभाव, सामाजिक जीवन एवं सामाजिक स्थिति। | ||
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