सौंग नदी बेसिन (जिला देहरादून) में अनियंत्रित अवैध बालू खनन तथा ग्रेवल की सतत पोषणीयता पर गहराता संकट
| Vol-3 | Issue-08 | August 2018 | Published Online: 07 August 2018 PDF ( 558 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| कु0 पूजा 1; डाॅ. आर. बी. गोदियाल 2 | ||
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1शोध छात्रा (भूगोल विभाग), हे.न.ब.गढवाल (केन्द्रिय) विश्वविद्यालय, स्वामी रामतीर्थ परिसर बादशाहीथौल टिहरी गढवाल। 2असिस्टेंट प्रोफेसर (भूगोल विभाग), हे.न.ब.गढवाल (केन्द्रिय) विश्वविद्यालय, स्वामी रामतीर्थ परिसर बादशाहीथौल टिहरी गढवाल। |
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| Abstract | ||
सतत पोषणीयता शब्द का अर्थ होता है कि हम प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों का प्रयोग इस तरीके से करें कि प्रत्येक भावी पीढ़ी को भी विकास का आधार प्राप्त हो सके परन्तु सतत पोषणीयता की विचारधारा को वर्तमान समय में कोई भी अनुसरण नहीं कर रहा है। मनुष्य प्राकृतिक ससंाधनों का असतत प्रयोग कर अपने विनाश की कड़ियों को स्वयं ही जोड़ता जा रहा है। खननकर्ता बेतरतीब तरीके से खनन कर नदी की सतत पोषणीयता को हानि पहुँचा रहा है। प्रकृति की एक समयस्वरूप परिभाषा होती है। प्रकृति के द्वारा दृश्य जगत में प्रत्येक दृश्य रूप, प्रत्येक पदार्थ, प्रत्येक परिघटना एक दीर्घ समयावधि का परिणाम होती है। डेविस महोदय के अनुसार ‘‘स्थलरूप, संरचना, प्रक्रम तथा समय का प्रतिफल होता है।’’ अतः किसी भी नदी को प्रवाहधारा के अनुरूप किसी चट्टान के कटाव (अपरदन) में तथा उसे बोल्डरों तथा महीन रेत के कणों में परिवर्तित करने में दीर्घ समयावधि की आवश्यकता होती है। प्रकृति जिस कार्य को पूर्ण करने में कई वर्षों का समय लेती है मनुष्य कुछ ही दिनों में उसका विनाश कर देता है। नदियों के तलों से बालू तथा ग्रेवल का खनन नदियों की पुनर्भरण क्षमता से अधिक हो रहा है जिसके फलस्वरूप कुछ नदियां प्रायःमृत होने की कगार पर हैं। |
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| Keywords | ||
| सततपोषणीयता, परिघटना, दृष्य जगत, प्रतिफल, अपरदन, प्रवाहधारा, प्रक्रम, ग्रेवल, बालू इत्यादि। | ||
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