दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन (सार्क): सफलताएं और चुनौतियाँ

Vol-3 | Issue-05 | May 2018 | Published Online: 24 May 2018    PDF ( 199 KB )
Author(s)
प्रिया कुमारी 1

1शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, बिहार- 846004

Abstract

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का कार्यभार संभालने और नई दिल्ली में अपने शपथ्र ग्रहण समारोह में दक्षिण एशिया के सभी देशों के नेताओं को आमंत्रित करके एक बड़ा कूटनीतिक कदम उठाने के ठीक 6 माह बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काठमांडो में 18 वें सार्क शिखर सम्मेलन में भाग लिया। दक्षिण एशिया पर ध्यान देने की बात मोदी सरकार बहुत पहले से ही करने लगी थी। प्रधानमंत्री की भूटान और नेपाल यात्रा तथा स्व. विदेशमंत्री सुषमा स्वराज की ढाका, थिम्पू, माले और काठमांडू के दौरों से इस बात को और बल मिला। इस पर यह बात भी ठीक बैठती है कि चूंकि इस क्षेत्र के देशों की नियति एक दूसरे के साथ अंतरंग रूप् से गुंथी हुई है अतः दुनिया भर के दर्जनों नेताओं से मिल कर और कई बड़े बहुपक्षीय शिखर सम्मेलनों में भाग लेने के बाद श्री मोदी भारत की एशियाई कूटनीति को अभिप्रेरित करने और आर्थिक एवं सांस्कृतिक रूप से एकीकृत क्षेत्र के स्वप्न को मूर्त रूप देने के लिए बार-बार पड़ोसी देशों की यात्रा करते हैं।
सार्क की स्थापना कुछ मूल भूत उद्देश्यों को ले कर की गई थी। ये माना गया था कि यदि क्षेत्र के देशों में आपसी सहयोग और मित्रता की भावना सुदृढ़ होगी तो वे परस्पर मिल बैठ कर आपसी समस्याओं का निराकरण कर सकेंगे। यही नहीं, यह क्षेत्र महाशक्तियों के आपसी संघर्ष के का क्षेत्र बनने से बचा रह सकेंगा। इसके संस्थापक जियाउर्ररमान ने कहा था ‘‘महत्वपूर्ण घटनाओं और राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर काफी अंतर हो सकता है, किंतु ये विभिन्नताएं ऐसी खाई बनाने में समर्थ नहीं हैं जिन पर पुल न बनाया जा सके। छुपा हुआ विश्वास आज इसके विकास का स्रोत है।”

Keywords
सार्क, संधि सफलता, चुनौतियाँ, व्यापार
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