सत्रीय नृत्य: एक प्रवाहमान परंपरा
| Vol-4 | Issue-10 | October 2019 | Published Online: 14 October 2019 PDF ( 273 KB ) | ||
| Author(s) | ||
उदिप्त तालुकदार
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1शोधार्थी, पी.एच.डी. हिंदी विभाग, गौहाटी विश्वविद्यालय गुवाहाटी, असम |
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| Abstract | ||
किसी भी समाज एवं जाति की पहचान उसकी संस्कृति से होती है । भारतीय संस्कृति अपनी भव्यता और स्वकीयता के कारण संपूर्ण विश्व में एक अलग पहचान बनाई हुई है । इस भव्य भारतीय संस्कृति के निर्माण में भारत के भिन्न प्रांतीय संस्कृतियों का योगदान अरिमित है। भारतीय सांस्कृतिक भवन के उत्तर-पूर्वी प्रांत को असमीया कला-संस्कृति ने प्राचीन काल से ही सुसज्जित बनाये रखा है । असमीया समाज-जीवन में महापुरुष शंकरदेव का आविर्भाव एक विस्मयकारी घटना रही । क्योंकि इन्होंने अपनी प्रतिभा की आभा से असमीया कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में जो दीपशिखा प्रज्वलित की वह आज भी प्रकाशमान है । शंकरदेव की शिल्पी-सत्ता की ही एक अन्यतम मौलिक सृष्टि रही सत्रीय नृत्य । इन्होंने जनमानस में भक्ति रस के संचार हेतु शास्त्रीय तथा स्थानीय उपादानों के संयोजन से सत्रीय नृत्य की शैली का निर्माण किया है । इस नृत्य परंपरा को सन् 2000 में संगीत नाटक अकाडेमी द्वारा शास्त्रीय नृत्य की मर्यादा मिली । इस स्वीकृति के साथ ही सत्रीय नृत्य में नवीन संभावनाएँ भी बनी तथा विभिन्न बाह्य प्रभावों के फलस्वरूप चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा । इस संक्रांतिकाल में सत्रीय नृत्य पर हुए विचार-विमर्श इसकी धारा को प्रवाहमान बनाये रखने में मददगार सिद्ध हो सकती है । अतः इसी उम्मीद के साथ सत्रीय नृत्य के विविध पहलुओं को इस आलेख में प्रस्तुत करने की कोशिश की जायेगी । |
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| Keywords | ||
| संस्कृति, सत्रीय नृत्य, शंकरदेव । | ||
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