वैदिक कालीन अध्ययन व्यवस्था की वर्तमान प्रासंगिकताः एक शिक्षा शास्त्रीय मीमांसा

Vol-4 | Issue-6 | June 2019 | Published Online: 10 June 2019    PDF ( 131 KB )
Author(s)
गोपाल गुर्जर 1

1प्रशिक्षु, एम.एड. क्षेत्रीय शिक्षा संसथान, एनसीइआरटी, अजमेर

Abstract

प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का क्रमिक विकास एक स्वाभाविक ढंग से हुआ था। उसकी जड़े समाज के अंतराल में थी तथा उसका विकास नैसर्गिक था। उसका एक उद्देश्य था और कुछ संदेश था। भारत के जंगलों और काननों के मध्य में स्थित प्रकृति की रमणीक सोभा से घिरे हुए विद्या केंद्र सभ्यता और संस्कृति के अगाध स्त्रोत थे जहाँ से मानवता का विकास हुआ। राजनीतिक तथा आर्थिक सिद्धांत क्षेत्र में भारत ने चाहे अधिक उन्नति नही की हो, क्योंकि उसका उद्देश्य सांसारिक पदार्थ संपन्नता की ओर इतना नहीं रहा, किंतु शिक्षा क्षेत्र में भारतीय देन अद्वितीय है। जब संसार की अन्य जातियां सभ्यता की बोली में केवल बड़बड़ाना ही सीख रही थी, भारत ने उच्च तत्वज्ञान की मीमांसा की। उसने अपनी सभ्यता के एक मानदंड की स्थापना की। भारत के प्राचीन शिक्षकों ने शिक्षा के एक विशिष्ट रूप का विकास किया, जिसके द्वारा लौकिक और पारलौकिक अनुभूतियों के समन्वय की स्थापना हुई और इस प्रकार भारतवर्ष माननीय पूर्णता की ओर अग्रसर हुआ। प्रस्तुत शोध के शोध उद्दश्यों आध्यात्मिकता, नैतिकता, सामाजिकता तथा शिक्षा के क्षेत्र में वेदों के अध्ययन की उपयोगिता का अध्ययन करने के आलोक में शोधार्थी ने प्रस्तुत शोध अध्ययन के माध्यम से वैदिक कालीन अध्ययन व्यवस्था की वर्तमान शिक्षा के संदर्भ में प्रासंगिकता का मूल्यांकन करने का प्रयत्न किया है।

Keywords
वैदिक अध्ययन, शिक्षा, प्रासंगिकता, मूल्यांकन
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