तिहरे शोषण की शिकार दलित नारी: एक समाजशास्त्रीय अध्ययन

Vol-4 | Issue-5 | May 2019 | Published Online: 25 May 2019    PDF ( 203 KB )
Author(s)
सुबोध कान्त 1

1शोध छात्र, सामाजिक बहिष्करण एवं समावेशी नीति अध्ययन केन्द्र, सामाजिक विज्ञान संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

Abstract

हमारे समाज की सबसे कमजोर कड़ी दलित नारी रही है, जिसका जातिवादी, पितृसत्तावादी तथा पूँजीवादी व्यवस्था ने मिलकर तिहरा शोषण व उत्पीड़न किया है और यह उत्पीड़न व शोषण वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में भी किसी न किसी स्वरूप में विद्यमान है। दलित नारियों का उत्पीड़न न सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्रों में हुआ है, बल्कि निजी ( घरेलू ) क्षेत्रों में भी अनवरत रूप से जारी है। सामाजिक परिवर्तन के फलस्वरूप इसके स्वरूपों व आयामों में भिन्नता व विविधता तो दर्ज की गयी है, परन्तु यह समाप्त नहीं हो रहा है, बल्कि उत्पीड़न के तरीके व पैमाने बदल गए हैं। आज दलित स्त्री को विभिन्न समतावादी कानूनी अधिकार प्राप्त हो जाने के पश्चात् भी इस प्रबल तिहरे शोषण एवं लगातार आसान शिकार ( सॉफ्ट टारगेट ) बनाये जाने के कारण वह वास्तविक सशक्तिकरण व समतावादी सामाजिक अधिकारों से काफी दूर और दयनीय दशा में है।

Keywords
तिहरा शोषण, जातिवादी व्यवस्था, पितृसत्तात्मक व्यवस्था, पूँजीवादी व्यवस्था, समतावादी अधिकार, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र
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