वर्तमान समय में भारत में प्रवजन एक विकट समस्या (जम्मू कश्मीर एवं उत्तराखंड के विशेष सन्दर्भ में)

Vol-4 | Issue-01 | January-2019 | Published Online: 20 January 2019    PDF ( 850 KB )
Author(s)
तान्या पुरी 1

1शोध छात्रा, मालवीय शांति अनुसंधान केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

Abstract

विश्व के किसी भी प्राचीन सभ्यता को अवलोकित करे तोहमें यह संज्ञान होता है की विश्व की कोई भी ऐसीसभ्यता नहीं है जिसका प्रारम्भ जिनआवश्यकतों एवं संसाधनोंके साथ हुआ था वह उन्हींआवश्यकताओं एवं संसाधनों के साथ सिमित रहा गया हो | वह नित नूतन नवाचार के साथ आगे बढ़ता गया है | मनुष्य प्राणी की यह विशेषता रही है वह हमेशा अपने आस -पास के घटनाओं से प्रभवित होता है | उनसे कुछ सीखने की कोशिश करता है | वह जिस आवश्यकतोंएवंसंसाधनों से युक्त जिंदगी जीता है उससे संतुष्ट नहीं रहता है | वह हमेशा बेहतर विकल्प की तलाश में अग्रसर रहता है | विश्व के किसी भी सभ्यता को देखे चाहे वोहड़प्पा , मेसोपोटामिया , मिस्त्र आदि सभ्यता को देखे तो इन सभ्यताओं कुछ स्थान मुख्य होते थे | जोबड़े बाजार या अन्य स्थान के रूप ज्यादा महत्वपूर्ण होता था प्रत्येक व्यक्ति सुदूर से आकर इस जगहों के आस -पास बसने लगे | यह जनसंख्या के प्रवास की प्रक्रिया कोई नयी प्रक्रिया नहीं है | बल्कि यह मानवीय सभ्यता के विकास के साथ ही जुड़ा हुआ है|आदि काल से ही मनुष्य अपने बेहतर जीवन की तलाश में एक गाँव से दूसरे गाँव ,एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त ,एक देश से दूसरे देश जाता रहा है | मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताऐउसे प्रवास कीओर आकर्षित करती रही है | ,परन्तु प्रवास की इच्छा प्रत्येक मनुष्य के अंदर भिन्न - भिन्न कारणों से उत्पन्न होती है | भिन्न -भिन्न समयों में प्रवास करते समय स्थान और रुचियाँ बदलती रही है | आदिकाल से ही प्रवास मनुष्य के स्वभाव का हिस्सा रहा है | प्राचीन हिन्दू समाज में तो समुन्द्र को पार करना मनाथा परन्तुसमय के साथ मनुष्य उस धारणा की अवहेलना कर विदेशों की ओर आकर्षित हुये |

Keywords
प्रवजन, संशाधन, जम्मू, उत्तराखंड
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