भारतीय कृषि अवसंरचना व भारतीय कृषि की समस्याएँ

Vol-3 | Issue-12 | December 2018 | Published Online: 10 December 2018    PDF ( 379 KB )
Author(s)
डॉ. चंचल शर्मा 1

1सहायक आचार्य, लोक प्रशासन विभाग, सेन्ट विलफ्रेड पी.जी. कॉलेज, मानसरोवर, जयपुर, राजस्थान (भारत)

Abstract

"आदिकाल से कृषि मनुष्य की आर्थिक क्रिया रही है क्योकि कृषि के द्वारा मनुष्यों को भोजन व वस्त्र की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति होती रही है। कृषि का इतिहास मनुष्य सभ्यता के इतिहास से जुडा हुआ है। खेती का श्री गणेश लगभग हजारों वर्ष पहले आदि मानव द्वारा किया गया । खानाबदोश और आखटे के असुरक्षित जीवन को छोडकर उसमे एक सुरक्षा पूर्ण जीवन की शुरुआत की तथा स्थायी हार बनाकर और कुछ फसलों के बीजो को बोकर आहार की उपलब्धता को सुनिश्चित किया ।
कृषि का उदभव एवं विकास इसी आदि मानव के इन्ही कृषि प्रयत्नो के साथ शुरु हुआ प्रारम्भ में उसने उन्ही बीजो को चुना, जिनका उनके आहार से सम्बन्ध था । उसने अपने अनुभव से यह जाना कि इन बीजो को कब बोना है तथा फसल को कब काटा जाना है पहले तो उसने भूमि को हाथ से कुरेद कर बीज बोया । बाद में आदि मानव ने पत्थर या हड्डियों के औजारो द्वारा मिट्टी खोद बीज बोया । इस प्रकार उसने अपनी कार्यकुशलता बढाकर श्रम की बचत की । एक ही क्षैत्र में लगातार फसल उगाने से उत्पादन में कमी आने लगी । इसके आधार पर मानव को स्थान परिवर्तन की प्रेरणा मिली । नये स्थानो पर भूमि के प्राकृतिक क्रियाओं के प्रभाव से फिर उपजाऊ हो गई । इस प्रकार स्थानान्तरी कृषि का विकास हुआ । जनसंख्या वृद्धि के साथ साथ भूमि की खेती का दबाव बढता गया और स्थानान्तरी खेती सम्भावनाएँ कम होती गई । परन्तु कृषि के पिछडे क्षैत्रो, विशेषकर भारत के आदिवासी क्षैत्रो में खेती की यह प्रणाली प्रचलित है ।
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Keywords
भारतीय कृषि का एतिहासिक स्वरुप, कृषि अवसंरचना भारतीय कृषि सम्बन्धी समस्याएँ
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